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Matric History Shaharikaran Avan Shahari Jivan Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] शहरीकरण एवं शहरी जीवन सब्जेक्टिव क्वेश्चन

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Matric History Shaharikaran Avan Shahari Jivan Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] शहरीकरण एवं शहरी जीवन सब्जेक्टिव क्वेश्चन

 

प्रश्न 1. शहरीकरण की प्रक्रिया में व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग एवं मजदूर वर्ग की भूमिका की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ शहरीकरण की प्रक्रिया में व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग एवं मजदूर वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही । शहरीकरण के साथ ही समाज में इन वर्गों का महत्त्व बढ़ता ही गया ।
व्यवसायी वर्ग – शहरीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ही व्यापार तथा वाणिज्य का विकास हुआ। नये-नये व्यवसायों के कारण विभिन्न व्यवसायी वर्ग की उत्पत्ति हुई। चूँकि व्यापार शहरों में ही होते थे, इसलिए शहरों में ही विभिन्न व्यवसायी वर्ग अस्तित्व में आये। व्यवसायी वर्ग नगरों के उद्भव का एक प्रमुख कारण व्यावसायिक पूँजीवाद के उदय के साथ संभव हुआ । व्यापक स्तर पर व्यवसाय, बड़े पैमाने पर उत्पादन, मुद्रा प्रधान अर्थव्यवस्था, शहरी अर्थव्यवस्था जिसमें काम के बदले वेतन मजदूरी का नगद भुगतान, एक गतिशील एवं प्रतियोगी अर्थव्यवस्था, स्वतंत्र उद्यम, मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति, मुद्रा, बैंकिंग, साख बिल का विनिमय, बीमा अनुबंध कम्पनी साझेदारी आदि व्यवसाय पूँजीवादी व्यवस्था की विशेषता रहे । शहरों में यह व्यवसायी वर्ग एक नये सामाजिक शक्ति के रूप में उभरकर आया ।
मध्यम वर्ग – शहरीकरण की प्रक्रिया ने समाज में मध्यम वर्ग के उदय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। शहरों के उद्भव ने मध्यम वर्ग को काफी शक्तिशाली बनाया । एक नये शिक्षित वर्ग का अभ्युदय जहाँ विभिन्न पेशों में रहकर भी औसतन एकसमान आय प्राप्त करनेवाले वर्ग के रूप में उभरकर आए एवं बुद्धिजीवी वर्ग के रूप में स्वीकार किये गये । यह मध्यम वर्ग विभिन्न रूप में शहरों में कार्यरत थे, जैसे शिक्षक, वकील, चिकित्सक, इंजीनियर, क्लर्क, एकाउंटेंट्स । इनके जीवन मूल्य के आदर्श समान रहे और इनकी आर्थिक स्थिति भी एक वेतनभोगी वर्ग के रूप में उभरकर आई । मजदूर वर्ग-आधुनिक शहरों में जहाँ एक ओर पूँजीपति वर्ग का अभ्युदय हुआ तो दूसरी ओर शहरों में श्रमिक या मजदूर वर्ग का भी उदय हुआ। सामंती व्यवस्था के अनुरूप विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के द्वारा सर्वहारा वर्ग का शोषण प्रारंभ हुआ जिसके परिणामस्वरूप शहरों में दो परस्पर विरोधी वर्ग उभरकर आये शहरों में कल-कारखानों की स्थापना के कारण कृषक वर्ग जो लगभग भूमिविहीन कृषि वर्ग के रूप में थे, बेहतर रोजगार के अवसर को देखते हुए भारी संख्या में शहरों की ओर पलायन दिये। अतः, शहरीकरण ने इन मजदूरों को रोजगार का अवसर मुहैया कराया जिसके कारण शहरों में मजदूर वर्ग का उदय हुआ ।

प्रश्न 2. ग्रामीण तथा नगरीय जीवन के बीच की भिन्न… को स्पष्ट करें ।

उत्तर ⇒ ग्रामीण तथा नगरीय जीवन के बीच काफा भिन्नताएँ हैं। जहाँ जनसंख्या की दृष्टि से गाँव की आबादी कम होती है, नगरों की आबादी ज्यादा होती है। आज शहरों में तेजी से बढ़ती रोजगार की अपार संभावनाओं ने ग्रामीण लोगों को शहरों की ओर पलायन करने को विवश किया है जिसके कारण शहरों की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है । शहरों में जनसंख्या का घनत्व गाँवों से अधिक है। गाँवों की अर्थव्यवस्था का स्रोत कृषि तथा पशुपालन है जो उनकी आजीविका का मुख्य साधन है, वहीं दूसरी ओर शहरों में व्यापार और उत्पादन आदि आजीविका के साधन गाँव का प्राकृतिक वातावरण काफी स्वच्छ होता है, लेकिन शहरों में बढ़ती जनसंख्या के कारण, फैक्ट्रियों के निर्माण के कारण वातावरण काफी प्रदूषित
होता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार आदि सुविधाएँ शहर में अधिक उन्नत अवस्था में होती हैं जबकि गाँव में इन सबों का अभाव होता है । आर्थिक तथा प्रशासनिक संदर्भ में भी ग्रामीण तथा नगरीय व्यवस्था में अंतर है । शहरों तथा नगरों से गाँव को उनके आर्थिक प्रारूप में कृषिजन्य क्रियाकलाप में एक बड़े भाग के आधार पर भी अलग किया जाता है। गाँव की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि संबंधी व्यवसाय से जुड़ा है। अतः, एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था मूलतः जीवन – निर्वाह अर्थव्यवस्था की अवधारणा पर आधारित थी । ऐसे वर्ग का नगरों की ओर बढ़ना एक गतिशील मुद्रा – प्रधान अर्थव्यवस्था के आधार पर संभव हुआ जो प्रतियोगी था एवं एक उद्यमी प्रवृत्ति से प्रेरित था। इसी सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के आधार पर प्रव्रजन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। आधुनिक शहरों के विकास ने भी लोगों को शहरी जीवन की ओर रूझान बढ़ाया । यह ऐसी प्रक्रिया है जहाँ क्रमशः नगरीय जनसंख्या का बड़े से बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्ष शहरों में बसने लगा। शहर ही प्रायः राजनीतिक प्राधिकार के केन्द्र बन गये जहाँ दस्तकार, व्यापारी और अधिकारी बसने लगे ।

प्रश्न 3. शहरी जीवन में किस प्रकार के सामाजिक बदलाव आये ?

उत्तर ⇒ शहरों का सामाजिक जीवन आधुनिकता के साथ अभिन्न रूप से जोड़ा जाता है । वास्तव में यह एक-दूसरे की अंतअभिव्यक्ति है । शहरों को आधुनिक व्यक्ति का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। सघन जनसंख्या के यह स्थल जहाँ कुछ मनीषियों के लिए अवसर प्रदान करता है वहीं यथार्थ में यह अवसर केवल कुछ व्यक्तियों को ही प्राप्त होता है । परंतु इन बाध्यताओं के बावजूद शहर ‘समूह पहचान’ के सिद्धांत को आगे बढ़ाते हैं जो कई कारणों से जैसे प्रजाति, धर्म, नृजातीय, जाति प्रदेश तथा समूह शहरी जीवन का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं । वास्तव में कम स्थान में अत्यधिक लोगों का जमाव, पहचान को और तीव्र करता है तथा उनमें एक ओर सह-अस्तित्व की भावना उत्पन्न करता है तो दूसरी ओर प्रतिरोध का भाव । अगर एक ओर सह-अस्तित्व की भावना है तो दूसरी ओर पृथक्करण की प्रक्रिया | शहरों में नये सामाजिक समूह बने । सभी वर्ग के लोग बड़े शहरों की ओर बढ़ने लगे । शहरी सभ्यता ने पुरुषों के साथ महिलाओं में भीव्यक्तिवाद की भावना को उत्पन्न किया एवं परिवार की उपादेयता और स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया । जहाँ पारिवारिक सम्बन्ध अब तक बहुत मजबूत थे वहीं ये बंधन ढीले पड़ने लगे । महिलाओं के मताधिकार आंदोलन या विवाहित महिलाओं के लिए सम्पत्ति में अधिकार आदि आंदोलनों के माध्यम से महिलाएँ लगभग 1870 ई० के बाद से राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा ले पाईं। समाज में महिलाओं की स्थिति में भी परिवर्तन आए । आधुनिक काल में महिलाओं ने समानता के लिए संघर्ष किया और समाज को कई रूपों में परिवर्तित करने में सहायता दी। ऐतिहासिक परिस्थितियाँ महिलाओं के संघर्ष के लिए कहीं सहायक सिद्ध हुई हैं तो कहीं बाधक । उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पाश्चात्य देशों में महिलाओं ने कारखानों में काम करना प्रारंभ किया। एक दूसरा उदाहरण है जहाँ महिलाएँ अपनी अस्मिता में परिवर्तन लाने में सफल हुई वह क्षेत्र था उपभोक्ता विज्ञापन । विज्ञापनों ने उपभोक्ता के रूप में महिलाओं को संवेदनशील बनाया ।
शहरी जीवन से समाज में नए-नए वर्गों का उदय हुआ । व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग, पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग ।

प्रश्न 4. शहरों के विकास की पृष्ठभूमि एवं उसकी प्रक्रिया पर प्रकाश डालें ।

उत्तर ⇒ शहरीकरण का अर्थ है किसी गांव के शहर या कस्बे के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया । शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार आदि सुविधाएँ शहरों में उन्नत अवस्था में होती हैं। गाँव से शहरों का विकास एक वृहत् प्रक्रिया है जो कई शताब्दियों पर फैली है। समाजशास्त्री के अनुसार नगरीय जीवन तथा आधुनिकता एक-दूसरे के पूरक हैं और शहर को आधुनिक व्यक्ति का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है । शहर व्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए अंतहीन संभावनाएँ प्रदान करता है । आधुनिक काल से पूर्व व्यापार एवं धर्म शहरों की स्थापना के महत्त्वपूर्ण आधार थे, ऐसे में वे क्षेत्र जो व्यापार मार्ग अथवा पतन और बन्दरगाहों के किनारे बसे थे । कुछ एक क्षेत्र जो मुख्य धार्मिक स्थल के रूप में भारी संख्या में भक्तों को आकर्षित करते थे तथा ये धार्मिक स्थल नगर अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ भी करते थे ।
मध्यकालीन सामंती सामाजिक संरचना एवं मध्यकालीन जीवन-मूल्य 13वीं शताब्दी तक अपने शिखर पर थे । नये प्रतिरोध के पश्चात् भी यह व्यवस्था लगभग सोलहवीं शताब्दी तक बनी रही । इस व्यवस्था ने नई एवं बाह्य शक्तियों को जो इसे परिवर्तित करना चाहती थीं यथासंभव नियंत्रित रखा, रोका और अपने में समाहित किया । अंततः, एक नई सामाजिक एवं राजनीतिक संरचना विकसित हुई जो अपनी परम्पराओं एवं स्वरूप के लिए प्राचीन परिपाटी के प्रति ऋणी तो थी किन्तु नवीन राजनीतिक एवं आर्थिक अवधारणाओं को स्वीकार करती थी जो अधिक लौकिक थी एवं जिज्ञासु प्रवृत्ति से प्रेरित थी । इसी पृष्ठभूमि में शहरी जीवन का पुनः उदय हुआ । कालांतर में ऐसे शहरों का विस्तार हुआ जिसमें मध्य परकोटों का निर्माण हुआ। ये शहर तथा इनके व्यस्त उद्यमी नागरिक भविष्य के दृष्टिगोचर एवं अग्रदूत थे । ये शहर नये राजमार्गों से जोड़े गये तथा इनके बीच सड़क एवं जलमार्गों द्वारा व्यापार होने लगा । शहरीकरण की प्रक्रिया बहुत लम्बी रही है लेकिन आधुनिक शहर के उदय का इतिहास लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। तीन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं ने आधुनिक शहरों की स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई। पहला, औद्योगिक पूँजीवाद का उदय, दूसरे विश्व के विशाल भूभाग पर औपनिवेशिक शासन की स्थापना और तीसरा लोकतांत्रिक आदर्शों का विकास। इस तरह ग्रामीण एवं सामंती व्यवस्था से हटकर एक प्रगतिशील शहरी व्यवस्था की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ी । औद्योगिकीकरण ने भी शहरीकरण के स्वरूप को काफी प्रभावित किया ।

 

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