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Matric History Press Sanskrti Avam Rashtravad Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] प्रेस सांस्कृति एवं राष्ट्रवाद सब्जेक्टिव क्वेश्चन
Class 10th History Subjective Question Class 10th Subjective Question

Matric History Press Sanskrti Avam Rashtravad Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] प्रेस सांस्कृति एवं राष्ट्रवाद सब्जेक्टिव क्वेश्चन

इतिहास ( History) प्रेस सांस्कृति एवं राष्ट्रवाद दीर्घ उत्तरीय सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024:- हैलो दोस्तो अगर आप मैट्रिक परीक्षा 2024 के लिए तैयारी कर रहे है तो यहां पर क्लास 10th History इतिहास का महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर ( Class 10th History Long Type vvi Subjective Question Answer ) दिया गया है यहां पर क्लास 10th इतिहास 2024 का मॉडल पेपर ( Class 10th History Model Paper ) तथा ऑनलाइन टेस्ट ( Online Test ) भी दिया गया है और PDF डाउनलोड कर के भी पढ़ सकते हैं । और आप मैट्रिक के फाइनल एग्जाम में अच्छा मार्क्स ला सकते हैं और अपने भाविष्य को उज्वल बना सकते है धन्यवाद

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Matric History Press Sanskrti Avam Rashtravad Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] प्रेस सांस्कृति एवं राष्ट्रवाद सब्जेक्टिव क्वेश्चन

 

प्रश्न 1. मुद्रण क्रांति ने आधुनिक विश्व को कैसे प्रभावित किया ?
अथवा, मुद्रण क्रांति के बहुआयामी का प्रभाव क्या थे ? विवरण दें ।

उत्तर ⇒ मुद्रण क्रांति के कारण छापाखानों की संख्या में वृद्धि हुई जिसके परिणामस्वरूप पुस्तक-निर्माण में अप्रत्याशित वृद्धि हुई । मुद्रणं क्रांति ने आम लोगों की जिन्दगी ही बदल दी | आम लोगों का जुड़ाव सूचना, ज्ञान, संस्था और सत्ता से नजदीकी स्तर पर हुआ । फलतः, लोक- चेतना एवं दृष्टि में बदलाव संभव हुआ । मुद्रण क्रांति के फलस्वरूप किताबें समाज के सभी तबकों तक पहुँच गईं। किताबों की पहुँच आसान होने से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई, एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ तथा पढ़ने से उनके अंदर तार्किक क्षमता का विकास हुआ । पठन-पाठन से विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ तथा तर्कवाद और मानवतावाद का द्वार खुला। धर्म-सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पंचानबे (95) स्थापनाएँ लिखीं । लूथर के लेख आम लोगों (स्वतंत्र विचारों के पोषक) में काफी लोकप्रिय हुए। कैथोलिक चर्च की सत्ता एवं उसके चरित्र पर लोगों द्वारा प्रश्न चिह्न उठाये जाने लगे । फलस्वरूप चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेट धर्म-सुधार आंदोलन की शुरुआत हुई । इस तरह छपाई से नये बौद्धिक माहौल का निर्माण हुआ एवं धर्म-सुधार आन्दोलन के नए विचारों का फैलाव बड़ी तेजी से आम लोगों तक हुआ। अब अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखे लोग धर्म को अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित हुए। कृषक से लेकर बुद्धिजीवी तक बाइबिल की नई-नई व्याख्या करने लगे। अब गाँव के गरीब भी सस्ती किताबों, चैपबुक्स, पंचाङ्ग, विलियोधिक व्ल्यू एवं इतिहास आदि की किताबों को पढ़ना शुरू किये। वैज्ञानिक और दार्शनिक बातें भी आम जनता की पहुँच से बाहर नहीं रहीं । न्यूटन, टामसपेन, वाल्तेयर और रूसो की पुस्तकें भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं ।

प्रश्न 2. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रेस की भूमिका एवं प्रभावों की समीक्षा करें।
अथवा, राष्ट्रीय आन्दोलन को भारतीय प्रेस ने कैसे प्रभावित किया ?
अथवा, भारतीय प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन को कैसे प्रभावित किया
अथवा, जनमानस तैयार करने में प्रेस की भूमिका होती है। किस प्रकार प्रेस ने राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रभावित किया ? कुछ प्रमुख वार्ता के साथ व्याख्या करें ।

उत्तर ⇒ जनमानस तैयार करने में प्रेस की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है । समाचार पत्र-पत्रिकाएँ विविध घटनाओं, समस्याओं तथा विचारों के सम्बन्ध में जनता को सूचना प्रदान करने का कार्य करती हैं। साधारणतया समाचार-पत्रों में प्रकाशित इन सूचनाओं और विचारों के आधार पर ही जनसाधारण अपने विचार का निर्माण करते हैं। शिक्षा के अधिकाधिक प्रचार-प्रसार से समाचार-पत्र जनमत निर्माण एवं उसकी अभिव्यक्ति के सबसे महत्त्वपूर्ण साधन बन गये हैं । प्रेस ने राष्ट्रीय आन्दोलन के हर पक्ष चाहे वह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हो या सांस्कृतिक सबको प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया । प्रेस के माध्यम से राष्ट्रीय नेताओं ने अंग्रेजी राज की शोषणकारी नीतियों का पर्दाफाश करते हुए जनजागरण फैलाने का कार्य किया । विदेशी सत्ता से त्रस्त जनता को सन्मार्ग दिखाने एवं साम्राज्यवाद के विरोध में निर्भीक स्वर उठाने का कार्य प्रेस के माध्यम से ही किया
गया ।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की स्थापना से पहले समाचार-पत्र देश में लोकमत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे । देशभक्तों ने लाभ पर व्यावसायिक दृष्टि से पत्रकारिता को नहीं अपनाया बल्कि इसे मिशन के रूप में अपनाया । समाचार-पत्रों ने राजनीतिक शिक्षा देने का दायित्व अपने ऊपर ले लिया । अधिकांश समाचार-पत्रों का रुख कांग्रेस की भावनावादी नीतियों से भिन्न था। राजनीतिक समस्याओं में भाग लेने के लिए समाचार-पत्र जनता को प्रोत्साहित करते थे। पूरे वर्ष समाचार-पत्रों में काँग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों की चर्चा होती रहती थी । इससे राष्ट्रीय चेतना का प्रचार द्रुत गति से होने लगा ।
देश के राष्ट्रीय आन्दोलन को नई दिशा देने एवं राष्ट्र-निर्माण में भी प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही । प्रेस ने सरकार की नीतियों की समीक्षा तथा जनमत का निर्माण कर लोकतांत्रिक तरीके से उसके विरोध का मार्ग प्रशस्त किया। सम्पूर्ण देश के लोगों के बीच सामाजिक कुरीतियों को दूर करने, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का कार्य भी किया गया । विदेशी राजनीतिक घटनाओं से स्वतंत्रता आन्दोलन को अनुप्रामाणित करने का कार्य भी प्रेस ने किया । लिंटन द्वारा वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट के माध्यम से समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध ने भी राष्ट्रीय आंदोलन एवं जनमानस को उद्वेलित किया। लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन ने तो भारतीय प्रेस एवं राष्ट्रीय आंदोलन दोनों को नया जीवन प्रदान किया । इस प्रकार, विभिन्न तरीकों से भारतीय प्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावित किया ।

प्रश्न 3. भारतीय प्रेस की विशेषताओं को लिखें।

उत्तर ⇒19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जागरूकता के अभाव के कारण सामान्य जनता से लेकर जमींदारों तक की रुचि राजनीति में नहीं थी, फलतः समाचार-पत्रों का वितरण कम था । पत्रकारिता घाटे का व्यापार थी । समाचार-पत्रों का जनमत पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होने के कारण अंग्रेज प्रशासक भी परवाह नहीं करते थे। फिर भी समाचार-पत्रों द्वारा न्यायिक निर्णयों में पक्षपात, धार्मिक हस्तक्षेप और प्रजातीय भेदभाव की आलोचना करने में भारतीय प्रेस की भूमिका के कारण धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों को बल मिला तथा भारतीय जनमत जागृत हुआ ।
1857 के विद्रोह के पश्चात् समाचार-पत्रों की प्रकृति का विभाजन प्रजताय आधार पर किया जा सकता है। भारत में दो प्रकार के प्रेस थे- ऐंग्लो-इंडियन प्रेस और भारतीय प्रेस । ऐंग्लो-इंडियन प्रेस की प्रकृति और आकार विदेशी था । यह भारतीयों में ‘फूट डालो और शासन करो’ का पक्षधर था । ऐंग्लो-इंडियन प्रेस को विशेषाधिकार प्राप्त था । सरकारी खबरें एवं विज्ञापन इसी को दिया जाता था । अंग्रेजी समाचार-पत्र सरकार का सदैव समर्थन करते थे, लेकिन देशी समाचार-पत्रों ने मुखर होकर साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ राष्ट्रवादी भावना को उत्पन्न किया । अकाल और सरकारी अपव्यय की खबरों को छापकर देशी प्रेस’ ने जनता के बीच भारी असंतोष को उत्पन्न किया ।
भारतीय समाचार-पत्र अँगरेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होते थे। 19वीं तथा 20वीं सदी में राजा राममोहन राय, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, बाल गंगाधर तिलक, दादाभाई नौरोजी, महात्मा गाँधी, मौलाना आजाद, मुहम्मद अली आदि ने भारतीय प्रेस को शक्तिशाली तथा प्रभावकारी बनाया। कलकत्ता से प्रकाशित इंगलिशमैन सबसे रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी समाचार-पत्र था, जबकि स्टेट्समैन उदार विचारों का पोषक था । यह सरकार और कांग्रेस दोनों की आलोचना करता था । पायनियार सरकार का समर्थक और भारतीयों का आलोचक था ।

प्रश्न 4. स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रेस की भूमिका की व्याख्या करें 
अथवा, आज के परिवर्तनकारी युग में प्रेस की भूमिका पर आलोचनात्मक टिप्पणी करें ।
अथवा, स्वतंत्र भारत में प्रेस की भूमिका पर प्रकाश डालें ।

उत्तर ⇒ वैश्विक स्तर पर मुद्रण अपने आदिकाल से भारत में स्वाधीनता आन्दोलन तक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए आज अपनी उपादेयता के कारण ऐसी स्थिति में पहुँच गया है कि इससे ज्ञान जगत की हर गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं। आज पत्रकारिता साहित्य, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान, प्रशासन, राजनीति आदि को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रही है
। आज के इस आधुनिक दौर में प्रेस साहित्य और समाज की समृद्ध चेतना की धरोहर है और पत्र-पत्रिकाएँ दैनिक गतिशीलता का लेखा हैं । स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य भले ही व्यावसायिक रहा हो, किन्तु इसने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचि जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है । पत्र-पत्रिकाओं ने दिन-प्रतिदिन घटनेवाली घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में नई और सहज शब्दावली का प्रयोग करते हुए भाषाशास्त्र के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेस ने समाज में नवचेतना पैदा कर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं दैनिक जीवन में क्रांति का सूत्रपात किया । प्रेस ने सदैव सामाजिक बुराइयों दहेज-प्रथा, विधवा- विवाह, बालिका – वध, बाल-विवाह जैसे मुद्दों को उठाकर समाज की कुप्रथाओं को दूर करने में मदद की तथा व्याप्त अंधविश्वास को दूर करने का प्रयास किया । आज प्रेस समाज में रचनात्मकता का प्रतीक भी बनता जा रहा है। यह समाज को नित्यप्रति की उपलब्धियों, वैज्ञानिक अनुसंधानों, वैज्ञानिक उपकरणों से परिचित कराता है। आज प्रेस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने हेतु सजग प्रहरी के रूप में हमारे सामने खड़ा है

प्रश्न 5. मुद्रण यंत्र की विकास यात्रा को रेखांकित करें । यह आधुनिक स्वरूप में कैसे पहुँचा ?

उत्तर ⇒ लेखन सामग्री के आविष्कार के पूर्व मानव चट्टानों तथा गुफाओं में अनुभवों एवं प्रसंगों. की खुदाई करके चित्रित करता था तथा मिट्टी की टिकियों का उपयोग करता था । 105 ई० में हस्-प्लाई – लून ( चीनी नागरिक) ने कपास एवं मलमल की पट्टियों से कागज बनाया । फलस्वरूप, कागज लेखन एवं चित्रकला का एक साधन बन गया । मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई । लगभग इसकी शुरुआत 594 ई. में लकड़ी के ब्लॉक के माध्यम से शुरू की गई । 760 ई० तक इसकी लोकप्रियता चीन और जापान में काफी बढ़ गई । ब्लॉक प्रिंटिंग का उपयोग अब पुस्तकों के पृष्ठ बनाने में होने लगा । लगभग 10वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक ब्लॉक प्रिंटिंग की प्रक्रिया द्वारा मुद्रा- पत्र भी छापे गये । मुद्रण कला के आविष्कार और विकास का श्रेय चीन को जाता है । 1041 ई० में एक चीनी व्यक्ति पि शेंग ने मिट्टी की मुद्रा बनाई। इन अक्षर मुद्रों को संयोजन कर छाप लिया जा सकता था । बार-बार अलग करके इसे संयोजित भी किया जा सकता था । इस पद्धति ने ब्लॉक प्रिंटिंग का स्थान ले लिया । धातु की मुवेबल टाइपों द्वारा प्रथम पुस्तक 13वीं सदी के पूर्वार्द्ध में मध्य कोरिया में छापी गई । यद्यपि मुवेबल टाइपों द्वारा मुद्रण कला का आविष्कार तो पूरब में ही हुआ, परन्तु इस कला का विकास यूरोप में अधिक हुआ । लकड़ी के ब्लॉक द्वारा होनेवाली मुद्रण कला समरकन्द, पर्शिया सीरिया मार्ग से (रेशममार्ग) व्यापारियों द्वारा यूरोप, सर्वप्रथम रोम में प्रविष्ट हुआ। 13वीं सदी के अंत में रोमन मिशनरी एवं मार्कोपोलो द्वारा ब्लॉक प्रिंटिंग के नमूने यूरोप पहुँचे । रोमन लिपि में अक्षरों की संख्या कम होने के कारण लकड़ी तथा धातु के बने मूवेबल टाइपों का प्रसार तेजी से हुआ । कागज बनाने की कला 11वीं सदी में पूरब से यूरोप पहुँची तथा 1336 ई० में प्रथम पेपर मिल की स्थापना जर्मनी में हुई । इसी काल में शिक्षा के प्रसार, व्यापार एवं मिशनरियों की बढ़ती गतिविधियों से सस्ती मुद्रित सामग्रियों की माँग तेजी से बढ़ी। इस माँग की पूर्ति के लिए तेज और सस्ती मुद्रण तकनीक की आवश्यकता थी जिसे (1430 के दशक में) स्ट्रेसबर्ग के योहान गुटेनबर्ग ने पूरा कर दिखाया । गुटेनबर्ग ने आवश्यकता के अनुसार मुद्रण स्याही भी बनायी तथा हैण्डप्रेस का प्रथम बार मुद्रण-कार्य सम्पन्न करने में प्रयोग किया ।

 

 

 

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