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Matric History Bharat Me Rashtravad Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] भारत में राष्ट्रवाद सब्जेक्टिव क्वेश्चन
Class 10th History Subjective Question Class 10th Subjective Question

Matric History Bharat Me Rashtravad Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] भारत में राष्ट्रवाद सब्जेक्टिव क्वेश्चन

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Matric History Bharat Me Rashtravad Subjective Questions 2024 [ इतिहास ] भारत में राष्ट्रवाद सब्जेक्टिव क्वेश्चन

 

1. असहयोग आंदोलन के कारणों एवं परिणामों का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ असहयोग आंदोलन के कारण-

(i) प्रथम विश्वयुद्ध के समय कांग्रेस ने अंग्रेजों का सहयोग किया था।

ब्रिटिश सरकार युद्ध पश्चात् भारत को डोमिनियन स्टेट्स देने का वादा
किया था। युद्ध के बाद परिस्थिति बदल गई, अब भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिकांश नेता पूर्ण स्वराज्य की माँग करने लगे। ब्रिटिश सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया।

(ii) 1919 के अधिनियम के अनुसार प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था की गई थी, जिसका विरोध भारतीयों ने किया ।

(iii) रॉलेट ऐक्ट आंदोलन का कारण बना, क्योंकि इस कानून के द्वारा किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर बिना सुनवाई के सजा दी जा सकती थी भारतीयों ने इस का का विरोध किया तथा इसे ‘काला कानून’ की संज्ञा दी गई। इसी की प्रतिक्रिया ने आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाई ।

(iv) जालियाँवाला बाग हत्याकांड ने आग में घी डालने वाला कार्य किया। यहाँ शांतिपूर्ण सभा में हजारों लोग उपस्थित होकर विरोध प्रकट कर रहे थे। जनरल डायर ने बिना चेतावनी के गोली चलवा दी, जिससे हजारों निर्दोष मारे गये तथा हजारों लोग घायल हो गये। इसी की प्रतिक्रिया में असहयोग आंदोलन हुआ ।

(v) गाँधीजी भी आंदोलन के संचालन के लिए सबसे बड़े हथियार थे। ये चम्पारण, खेड़ा सत्याग्रह को सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांत के आधार पर सफल कर चुके थे । अतः, पहले से सफल पृष्ठभूमि गाँधीजी द्वारा तैयार थी, जिसका प्रयोग असहयोग जन-आंदोलन में किया गया । असहयोग आंदोलन के परिणाम असहयोग आंदोलन को वापस लेने तथा गाँधीजी के गिरफ्तार हो जाने के कारण खिलाफत का मुद्दा समाप्त हो गया । अब हिन्दू-मुस्लिम एकता खत्म हो गई तथा एकता की जगह साम्प्रदायिकता ने ले ली। इस आंदोलन से स्वराज की प्राप्ति नहीं हो सकी तथा न ही पंजाब के अन्यायों का न्यायपूर्वक निवारण हुआ। लेकिन, इन असफलताओं के बावजूद इस आंदोलन की उपलब्धि यह रही कि पूरे भारत की जनता का विश्वास काँग्रेस एवं गाँधीजी के प्रति बढ़ गई । भारत में पहली बार कोई जनान्दोलन एक साथ चलाया गया। पूरे भारत को एकता के सूत्र में बाँधनेवाली भाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता मिली तथा चरखा एवं करघा को भी बढ़ावा मिला ।

प्रश्न 2. सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों की विवेचना करें ।
अथवा, सविनय अवज्ञा आन्दोलन का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(i) नेहरू रिपोर्ट साइमन कमीशन का बहिष्कार करने पर भारत सचिव लॉर्ड बर्कन हेड ने भारतीयों को संविधान बनाने की चुनौती दी। उसने कहा कि कमीशन का बहिष्कार करना कोई समझदारी नहीं है, क्योंकि भारतीय स्वयं कोई संविधान नहीं बना सकते । काँग्रेस ने इस चुनौती को स्वीकार किया। 19 मई, 1928 को पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में भारतीय संविधान का आधार निश्चित करने के लिए एक समिति नियुक्त की गई। नेहरू रिपोर्ट में ‘डोमिनियन स्टेट्स’ को पहला लक्ष्य एवं ‘पूर्ण स्वराज’ को दूसरा लक्ष्य घोषित किया गया । यह रिपोर्ट स्वीकृत नहीं हो सकी। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने साम्प्रदायिकता को फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अतः, गाँधी ने इससे निबटने के लिए सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम प्रस्तुत किया ।

(ii) विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाव 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा पड़ा। इसके प्रभाव के कारण मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई, भारत का निर्यात कम हो गया, अनेक कारखाने बंद हो गये, पूँजीपतियों की हालत खराब हो गई । किसान तो पहले से ही गरीबी की मार झेल रहे थे । परन्तु, इस परिस्थिति में भी अंग्रेजों ने भारत से धन का निष्कासन बंद नहीं किया । इस कारण पूरे देश में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ वातावरण तैयार होने लगा जिसकी परिणति सविनय अवज्ञा आंदोलन के रूप में हुई ।

(iii) समाजवाद का बढ़ता प्रभाव इस समय काँग्रेस संगठन के अंदर मार्क्सवादी एवं समाजवादी विचारधारा तेजी से फैल रही थी। काँग्रेस के अंदर वामपंथी विचारधारा का उदय हो रहा था। इस विचारधारा से प्रभावित कांग्रेसी नेता में जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस मुख्य थे । अतः, वामपंथी दबाव को संतुलित करने के लिए एक आंदोलन की आवश्यकता थी ।

(iv) क्रांतिकारी आंदोलनों का उभार असहयोग आंदोलन को वापस लेने के बाद क्रांतिकारी आंदोलन अधिक उग्र एवं संगठित होने लगा था। ‘मेरठ षड्यंत्र किया था। युद्ध के बाद परिस्थिति बदल गई, अब भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिकांश नेता पूर्ण स्वराज्य की माँग करने लगे। ब्रिटिश सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया।

(ii) 1919 के अधिनियम के अनुसार प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था की गई थी, जिसका विरोध भारतीयों ने किया ।

(iii) रॉलेट ऐक्ट आंदोलन का कारण बना, क्योंकि इस कानून के द्वारा किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर बिना सुनवाई के सजा दी जा सकती थी भारतीयों ने इस कानून का विरोध किया तथा इसे ‘काला कानून’ की संज्ञा दी गई। इसी की प्रतिक्रिया ने आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाई ।

(iv) जालियाँवाला बाग हत्याकांड ने आग में घी डालने वाला कार्य किया। यहाँ शांतिपूर्ण सभा में हजारों लोग उपस्थित होकर विरोध प्रकट कर रहे थे। जनरल डायर ने बिना चेतावनी के गोली चलवा दी, जिससे हजारों निर्दोष मारे गये तथा हजारों लोग घायल हो गये। इसी की प्रतिक्रिया में असहयोग आंदोलन हुआ ।

(v) गाँधीजी भी आंदोलन के संचालन के लिए सबसे बड़े हथियार थे। ये चम्पारण, खेड़ा सत्याग्रह को सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांत के आधार पर सफल कर चुके थे । अतः, पहले से सफल पृष्ठभूमि गाँधीजी द्वारा तैयार थी, जिसका प्रयोग असहयोग जन-आंदोलन में किया गया ।
असहयोग आंदोलन के परिणाम असहयोग आंदोलन को वापस लेने तथा गाँधीजी के गिरफ्तार हो जाने के कारण खिलाफत का मुद्दा समाप्त हो गया । अब हिन्दू-मुस्लिम एकता खत्म हो गई तथा एकता की जगह साम्प्रदायिकता ने ले ली । इस आंदोलन से स्वराज की प्राप्ति नहीं हो सकी तथा न ही पंजाब के अन्यायों का न्यायपूर्वक निवारण हुआ। लेकिन, इन असफलताओं के बावजूद इस आंदोलन की उपलब्धि यह रही कि पूरे भारत की जनता का विश्वास काँग्रेस एवं गाँधीजी के प्रति बढ़ गई। भारत में पहली बार कोई जनान्दोलन एक साथ चलाया गया। पूरे भारत को एकता के सूत्र में बाँधनेवाली भाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता मिली तथा चरखा एवं करघा को भी बढ़ावा मिला ।

प्रश्न 3. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गाँधी सर्वाधिक लोकप्रिय क्यों हुए ? उनके राजनीतिक कार्यक्रमों पर संक्षिप्त चर्चा करें ।

उत्तर ⇒ भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में जितना योगदान महात्मा गाँधी का है संभवत: उतना किसी और भारतीय का नहीं है। 1919 से 1947 तक या
ई. स्वतंत्रता प्राप्ति तक आप भारत की राजनीति पर इस प्रकार छाये रहे कि बहुत-से इतिहासकारों ने इस काल को ‘गाँधी युग’ नाम दिया है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं ।

(i)देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेते हुए उन्होंने अन्य नेताओं का मार्गदर्शन भी किया । आपने अहिंसा की नीति अपनाकर शांतिपूर्ण ढंग से शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार को झुका दिया ।

(ii) आपने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कोई सशक्त संघर्ष या क्रांति नहीं की बल्कि असहयोग, सत्याग्रह, बहिष्कार, स्वदेशी आंदोलन आदि शांतिपूर्ण हथियारों का प्रयोग किया ।

(iii) आपने हिन्दू-मुस्लिम एकता को बनाये रखने के लिए बहुत प्रयत्न किये ताकि अंग्रेजों द्वारा अपनायी गयी ‘फूट डालो और राज करो’ की साम्प्रदायिकतापूर्ण नीति सफल न हो सके ।

(iv) आपने हरिजनों को पूर्ण सम्मान दिलाया और सदियों से उनके साथ होने वाले अन्याय को दूर किया। ।

(v) वास्तव में गाँधीजी देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए सदा तैयार रहते थे। ऐसा करते हुए कई बार गोलियों के बीच जाना पड़ा, कई बार लाठियाँ खानी पड़ीं और कई बार जेल जाना पड़ा। फिर भी वे अपने मार्ग पर डटे रहे और वीर सेनानी की भाँति अपने देश की आजादी की लड़ाई में लगे रहे।

(vi) उनके महान नेतृत्व तथा बलिदान के फलस्वरूप अंग्रेज जिन्होंने जून 1948 ई० को भारत छोड़ने की घोषणा की थी, इससे पहले ही 15 अगस्त, 1947 ई० को छोड़कर यहाँ से चले गये ।

(vii) यह महात्मा गाँधी ही थे जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन बना दिया ।

(viii) महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गये विभिन्न आन्दोलन जैसे असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन आदि में अधिकतर जनसाधारण ही थे जिन्होंने बढ़ चढ़कर भाग लिया।

(ix) महात्मा गाँधी के नेतृत्व में जनता ने अपनी एकता की शक्ति को पहचाना । महात्मा गाँधी ने ही साधारण लोगों में नए उत्साह का सजन किया और उनमें आत्मबल पैदा किया। लोगों ने उनके नेतृत्व में रहकर कुर्बानी और आत्म निर्भरता का पाठ पढ़ा और अपने देश को स्वतन्त्र कराने में सफलता प्राप्त की।

प्रश्न 4 भारतीयों द्वारा वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट का विरोध क्यों किया गया ?

उत्तर ⇒ वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट 1878 ई० में लॉर्ड लिंटन द्वारा पारित किया गया। इसके तहत भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले सभी समाचार-पत्रों पर नियंत्रण लगा दिया। यह ऐक्ट अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों पर लागू नहीं किया गया। इसके फलस्वरूप भारतीयों ने इस ऐक्ट का बड़े जोर से विरोध किया। इस अधिनियम के तहत किसी भी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार-पत्रों को न्यायालय में अपील करने का कोई अधिकार नहीं था । इसलिए भारतीयों ने वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट का विरोध किया।

प्रश्न 5. राष्ट्रवाद के उदय के कारणों एवं परिणामों की चर्चा करें ।

उत्तर ⇒ राष्ट्रवाद के उदय एवं विकास के प्रभावी कारकों एवं शक्तियों की विवेचना निम्नलिखित प्रकार से की जा सकती है –

(i) सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन–19वीं शताब्दी के धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों ने राष्ट्रवाद उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन तथा थियोसोफिकल सोसाइटी जैसी संस्थाओं ने हिन्दू धर्म में प्रचलित बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया । अंधविश्वास, धार्मिक कुरीतियाँ तथा सामाजिक कुप्रथाएँ, छुआछूत, बाल-विवाह, दहेज प्रथा एवं बालिका हत्या जैसी समस्याओं के समाधान के लिए जनमत तैयार करने में इन संस्थाओं ने सराहनीय कार्य किया । परिणामस्वरूप, सुधार आंदोलनों ने राष्ट्रीयता की भावना जनमानस में कूट-कूटकर भर दी ।

(ii) आर्थिक शोषण-भारत में अंग्रेजों ने जो आर्थिक नीतियाँ अपनायीं इसके परिणामस्वरूप आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय हुआ । ब्रिटिश आर्थिक नीति के तहत भारत में भू-राजस्व में अत्यधिक वृद्धि हुई । इस व्यवस्था का विरोध एक तरफ किसानों ने किया तो दूसरी तरफ पुराने जमींदारों ने भी किया, क्योंकि स्थायी बन्दोबस्त में ‘सूर्यास्त कानून’ के कारण पुराने जमींदारों द्वारा एक नियत समय पर भू-राजस्व जमा नहीं करने पर उनकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी । कृषि के व्यावसायीकरण के कारण किसानों का दोहरा शोषण हुआ । एक ओर उनसे अधिकतम राजस्व वसूला गया तो दूसरी ओर इस राजस्व को अदा करने के लिए महाजनों के ऋण जाल में फँसते चले गये ।

(iii) तात्कालिक कारण – लॉर्ड लिंटन का प्रतिक्रियावादी शासन राष्ट्रवाद का तात्कालिक कारण बना, जैसे –

(a) लिंटन ने 1876 में सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु – सीमा 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी । इससे भारतीयों के लिए इस नौकरी के दरवाजे लगभग बंद हो गए।

(b) 1877 ई० में भारत में भयंकर अकाल पड़ा था। अकाल में लोगों को बचाने के बजाए खर्चीले ‘दिल्ली दरबार’ का आयोजन किया गया, जिसमें विक्टोरिया को ‘कैंसर-ए-हिन्द’ की उपाधि दी गई ।

(c) 1878 में लिंटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट पारित कर भारतीय भाषी समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया। इस ऐक्ट द्वारा अंग्रेजी समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया ।

प्रश्न 6. प्रथम विश्वयुद्ध का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ अंतर्संबंधों की विवेचना करें ।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के कारण और परिणाम का भारत से अंतर्संबंध –

(i) प्रथम विश्वयुद्ध के कारणों के साथ भारत का अंतर्संबंध प्रथम विश्वयुद्ध भारत सहित अन्य एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में स्थापित उपनिवेशों को सुरक्षित रखने के लिए लड़ा गया । भारत, ब्रिटेन का सबसे महत्त्वपूर्ण उपनिवेश था तथा भारत को प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति में भी सुरक्षित रखना बहुत जरूरी था, युद्ध शुरू होने के पश्चात् ब्रिटेन की सरकार ने घोषणा की कि ब्रिटेन के शासन करने का उद्देश्य यहाँ एक जिम्मेवार सरकार की स्थापना करना है तथा स्वराज की स्थापना भारत जैसे देश में लागू किया जाएगा। सरकार ने 1916 में आयात शुल्क लगाया ताकि भारत में वस्त्र उद्योग का विकास हो सके।

(ii) प्रथम विश्वयुद्ध के समय का भारतीय घटनाक्रम इस समय की सभी घटनाएँ युद्ध से उत्पन्न परिस्थिति की देन थीं । तिलक एवं गाँधीजी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार को सहयोग किया, इस उम्मीद से कि युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार इनके स्वराज की माँग को मान लेगी। परन्तु इनका भ्रम शीघ्र ही टूट गया। 1915-17 ई० में एनी बेसेंट और तिलक ने आयरलैंड से प्रेरित होकर भारत में भी होमरूल आंदोलन आरंभ किया। इसका उद्देश्य वैधानिक उपायों द्वारा स्वशासन प्राप्त करना था । मार्च, 1916 में तिलक ने महाराष्ट्र में होमरूल लीग की स्थापना की जिसका केन्द्र पूना में था। युद्धकाल में ही क्रांतिकारी आंदोलन का विकास भारत एवं विदेशों में हुआ। भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का मुख्य केन्द्र बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा संपूर्ण उत्तरी भारत था। विदेशों में यह अमेरिका और कनाडा में बसे भारतीयों द्वारा चलाया गया। 1913 ई० में लाला हरदयाल ने ‘गदर पार्टी’ की स्थापना सेन फ्रांसिस्कों ने किया । इन्होंने ‘हिन्दुस्तान ‘गदर’ समाचार-पत्र के माध्यम से ब्रिटिश विरोधी विचारों तथा क्रांतिकारी दर्शन का प्रसारण किया। 1916 में दो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ घटी, प्रथम राजनीतिक घटना काँग्रेस के दोनों दल गरम दल तथा नरम दल मिलकर एक हो गये तथा दूसरी घटना 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन द्वारा काँग्रेस एवं मुस्लिम लीग के बीच समझौता हुआ। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गाँधीजी का अभ्युदय युद्धकाल के दौरान हुआ । इसी काल में उन्होंने चम्पारण, खेड़ा और अहमदाबाद जैसे तीन सफल सत्याग्रहों का संचालन किया ।

प्रश्न 7. भारत में मजदूर आन्दोलन के विकास का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी की शुरुआत में राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों ने मजदूर वर्ग के हितों की शक्तिशाली पूंजीपतियों से रक्षा के लिए कानून बनाने की वकालत शुरू कर दी । स्वदेशी आंदोलन का भी प्रभाव मजदूर आंदोलन पर पड़ा तथा इसका संदेश पूरे भारत में फैला। इसमें अहमदाबाद का मजदूर आंदोलन प्रमुख था । 1917 में अहमदाबाद में प्लेग की महामारी फैली, अहमदाबाद में पहले से ही श्रमिकों की कमी थी । प्लेग फैलने के बाद अधिकांश श्रमिक शहर छोड़कर गाँव जाने लगे । श्रमिकों को शहर में रोकने के लिए मिल मालिकों ने ‘प्लेग बोनस’ देने की घोषणा की जो साधारण मजदूरी का 50% होता था, लेकिन महामारी खत्म होते ही बोनस देना बंद कर दिया, जिसका श्रमिकों ने विरोध किया ।
गाँधीजी को भी आंदोलन से जुड़ने का मौका मिला। गाँधीजी ने श्रमिक और मिल मालिकों के बीच मध्यस्थता बोर्ड द्वारा समझौता कराने का प्रयास किया । गाँधीजी इस बोर्ड में श्रमिकों के प्रतिनिधि बने, परन्तु अचानक मिल मालिक मध्यस्थता से पीछे हटते हुए मिल में तालाबंदी की घोषणा कर दी। गाँधीजी ने अहमदाबाद के मजदूरों को 50% के स्थान पर 35% मजदूरी में बढ़ोतरी की माँग करने की सलाह दी, साथ ही यह भी कहा कि जब तक उनकी मजदूरी में 35% की वृद्धि नहीं होती तब तक वे शांतिपूर्ण सत्याग्रह करते रहेंगे । जब तक कोई समझौता नहीं हो जाता, गाँधीजी भूख हड़ताल पर चले गये। अंततः, मिल-मालिकों ने गाँधीजी के प्रस्ताव को मानते हुए मजदूरों के पक्ष में 35% की वृद्धि का निर्णय लिया । इस प्रकार यह आंदोलन सफल हुआ । 1920 के बाद साम्यवादी प्रभाव के कारण मजदूर संघ आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा । इसमें कुछ क्रांतिकारी और सैनिक भावना आ गई। 1923 में गिरनी कामगार यूनियन के नेतृत्व में बंबई टेक्सटाइल मिल में 6 माह लंबी हड़ताल का आयोजन किया गया । उग्रवादी प्रभाव में आने के कारण सरकार ने मजदूर संघ आंदोलन पर रोक लगाने के लिए वैधानिक कानूनों का सहारा लिया । इसे रोकने के लिए सरकार ने श्रमिक विवाद अधिनियम, 1929 तथा नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1929 बनाये । 1930 में गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन में श्रमिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया परन्तु 1931 के बाद इसमें कुछ कमी आ गई। इसका कारण था – 1931 ई० में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन काँग्रेस में विभाजन । एम० एन० जोशी, बी० बी० गिरि और मृणाल कांति बोस आदि ने एटक से अलग होकर भारतीय ट्रेड यूनियन संघ (Indian Trade Union Federation) की स्थापना की। इसके बाद श्रमिक आंदोलन में नेहरू एवं सुभाषचंद्र बोस जैसे वामपंथी राष्ट्रवादियों का
प्रभाव रहा । मेरठ षड्यंत्र केस में सरकार ने 31 श्रमिक नेताओं को बंदी बनाकर मेरठ में उनपर मुकदमा चलाया । इनपर आरोप था कि ये सम्राट को प्रभुसत्ता से वंचित करना चाहता थे। गिरफ्तार नेताओं में मुजफ्फर अहमद, एस० एन० डांगे, फिलिप स्प्राट, ब्रेन बेडली तथा शौकत उस्मानी प्रमुख थे

प्रश्न 8. अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कैसे हुई ? इसके प्रारंभिक उद्देश्य क्या थे ?

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना से ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा एवं गति मिली। हालाँकि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना के पूर्व क्षेत्रीय स्तर पर भारत में कई संगठन स्थापित हो चुके थे, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर कोई राजनीतिक संगठन नहीं था जो भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए मार्ग प्रशस्ति का काम कर सके। लॉर्ड लिंटन द्वारा बनाये गये। प्रेस अधिनियम और शस्त्र अधिनियम का भारतीयों द्वारा जबर्दस्त विरोध किया गया, जिसके कारण सरकार को प्रेस अधिनियम वापस लेना पड़ा था । राष्ट्रवादियों को लगने लगा कि संगठित होकर विरोध करना ज्यादा कारगर होगा लॉर्ड रिपन के काल में हुए इस्बर्ट बिल विवाद का यूरोपियनों द्वारा संगठित विरोध से प्राप्त विजय ने भारतीय राष्ट्रवादियों को संगठित होने का पर्याप्त कारण दे दिया । अतः, 1883 के दिसंबर में इंडियन एसोसिएशन के सचिव आनन्दमोहन बोस ने कलकत्ता में ‘नेशनल कांफ्रेंस’ नामक एक अखिल भारतीय संगठन का सम्मेलन बुलाया जिसका उद्देश्य बिखरे राष्ट्रवादियों को एकजुट करना था। दूसरी तरफ एक रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारी ऐलेन ऑक्ट्रोवियन ह्यूम ने इस दिशा में प्रयास करते हुए 1884 में ‘भारतीय राष्ट्रीय संघ’ की स्थापना की। इन्हें ब्रिटिश संसदीय कमिटी का भी समर्थन प्राप्त था । इसी संगठन का नाम बदलकर 1885 ई० में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस कर दिया गया ।

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रारंभिक उद्देश्य निम्नलिखित थे –

(i) भारत के विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय हित के काम से जुड़े लोगों के संगठनों के बीच एकता की स्थापना का प्रयास ।

(ii) देशवासियों के बीच मित्रता और सद्भावना का संबंध स्थापित कर धर्म, वंश, जाति या प्रांतीय विद्वेष को समाप्त करना ।

(iii) राष्ट्रीय एकता के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के लिए हरसंभव प्रयास करना ।

(iv) प्रार्थना पत्रों तथा स्मार पत्रों द्वारा वायसराय एवं उनकी काउन्सिल से सुधारों हेतु प्रयास करना ।

प्रश्न 9. भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में जनजातीय लोगों की क्या भूमिका

उत्तर ⇒ भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में जनजातीय लोगों की प्रमुख भूमिका रही। 19 शताब्दी की तरह 20वीं शताब्दी में भी भारत के अनेक भागों में आदिवासी विद्रोह हुए। इन विद्रोहों में रम्पा विद्रोह, अलमूरी विद्रोह, उड़ीसा का खोड़ विद्रोह, यह 1914 से 1920 तक चला। 1917 में मयूरभंज में संथालों एवं मणिपुर मे ‘पोडोई कुकियों’ ने विद्रोह किया था।

1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय पश्चिमोत्तर प्रान्त के जनजातियों ने तीव्र राष्ट्रवादी भावना दिखाई। दक्षिणी बिहार के आदिवासियों ने भी राष्ट्रीय चेतना का परिचय दिया।

इस प्रकार भारत के कोने-कोने से आदिवासी जनता ने समय-समय पर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया।

प्रश्न 10. बंगाल विभाजन के विरुद्ध आन्दोलन की समीक्षा करें

उत्तर ⇒ 1857 ई. के विद्रोह में हिन्दू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजों को अचम्भित

कर दिया था। इस विद्रोह के बाद अंग्रेज सोचने पर मजबूर हुए क्योंकि भारत में जहाँ धार्मिक एवं जातीय विभाजन काफी कठोर है वहाँ दोनों सम्प्रदाय को बाँट देने पर शासन करने में आसानी होगी। इसलिए अंग्रेजों ने 1905 में लॉर्ड कर्जन के नेतृत्व में बंगाल विभाजन की घोषणा की जिसके द्वारा पूरे बंगाल को दो प्रान्तों पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल में बाँट दिया गया। पूर्वी बंगाल को मुस्लिम प्रान्त का नाम दिया गया और पश्चिमी बंगाल को हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र माना गया। इसका उद्देश्य बंगाल के आन्दोलन कम करना था। इसी के लिए उसने फूट डालो और शासन करो की नीति को अपनाया। इसके पहले बंगाल राष्ट्रीय आन्दोलन का सबसे बड़ा केन्द्र था। इस कार्य से आन्दोलन कमजोर पड़ सकता था। बंगाल प्रदेश का शिक्षित वर्ग हिंसक और अहिंसक दोनों तरह के आन्दोलनों में आगे था। लेकिन अंग्रेजों द्वारा कहा गया कि इससे प्रशासन में आसानी होगी। इस योजना का असल रहस्य था हिन्दू-मुसलमानों में फूट डालना तथा बंगाल को राष्ट्रीय आन्दोलन में कमजोर करना था। बंगाल विभाजन को वहाँ के निवासियों ने अपने राष्ट्रीयता और संस्कृति पर आघात समझा और इस विभाजन का पुरजोर विरोध किया

प्रश्न 11. जालियाँवाला बाग में किस कानून के विरोधस्वरूप लोग इकट्ठे हुए थे ? उस वक्त क्या घटना हुई थी ? इस घटना की भारतीय जनमानस पर क्या प्रतिक्रिया हुई ?

उत्तर ⇒

(i) रॉलेट ऐक्ट के विरोधस्वरूप लोग जालियाँवाला बाग में इकट्ठे हुए थे। यह कानून एक काला कानून था, जिसमें किसी भारतीय को बिना कारण बताए गिरफ्तार किया जा सकता था तथा मुकदमा चलाया जा सकता था।

(ii) 9 अप्रैल, 1919 को दो स्थानीय नेताओं डॉ. सत्यपाल एवं किचलू को गिरफ्तार किया गया ।

(iii) इनकी गिरफ्तारी के विरोधस्वरूप 13 अप्रैल, 1919 को जालियाँवाला बाग में गोलियाँ चलीं जिसमें निर्दोष लोग मारे गये ।

(iv) इस नरसंहार के विरोध में रविन्द्रनाथ टैगोर ने ‘नाइट’ की उपाधि त्याग दी। शंकरन नायर ने वायसराय की कार्य समिति से इस्तीफा दे दिया । गाँधीजी ने ‘कैसर-ए-हिन्द’ की उपाधि त्याग दी ।

प्रश्न 12. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथियों की भूमिका का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ वामपंथी शब्द का प्रथम प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति में हुआ। 20वीं शताब्दी प्रारंभ से ही भारत में साम्यवादी एवं समाजवादी विचारधाराएँ फैलने लगीं। इन विचारों से जुड़े लोगों में श्रीपाद अमृत डांगे, मुजफ्फर अहमद, गुलाम हुसैन, मौलवी बरकतुल्ला प्रमुख थे । इन्होंने अपने पत्रों के द्वारा साम्यवादी विचारों का प्रसार किया । रूसी क्रांति के बाद साम्यवादी विचार भारत में तेजी से फैलने लगा। 1920 में मानवेन्द्र नाथ राय (एम० एन० राय) ने ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। परन्तु भारत में अभी तक ये गुप्त रूप से काम कर रहे थे। असहयोग आन्दोलन के समय में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचारों का प्रसार किया तथा उग्रवादी राष्ट्रवादी आंदोलनों से भी अपना संबंध स्थापित किया, यही कारण था कि असहयोग आंदोलन के बाद सरकार ने इन लोगों का दमन करना शुरू किया तथा पेशावर षड्यंत्र केस (1922-23), कानपुर षड्यंत्र केस (1924), मेरठ षड्यंत्र केस (1929-33) के द्वारा 8 लोगों पर मुकदमा चलाया। आगे साम्यवादियों को कांग्रेस का समर्थन भी मिला, क्योंकि सरकार द्वारा चलाए गए ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ को काँग्रेस ने पारित नहीं होने दिया । यह कानून कम्युनिस्टों के विरोध में था। दिसम्बर, 1925 में सत्यभक्त ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की ।

मजदूर संघों के गठन के बाद 1920 में ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस’ (AITUC) की स्थापना हुई लेकिन 1926 में इसमें विभाजन हो गया तथा 1929 में एम० एन० जोशी ने ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन फेडरेशन’ (AITUF) का गठन कर लिया । इस तरह वामपंथ का प्रसार मजदूर संघों पर बढ़ने लगा । किसान-मजदूर पार्टी की स्थापना करके किसानों को भी साम्यवाद से जोड़ने का प्रयास किया गया । लेबर स्वराज्य पार्टी भारत की प्रथम किसान-मजदूर पार्टी थी। दिसम्बर, 1928 में अखिल भारतीय मजदूर किसान पार्टी बनी। आगे काँग्रेसियों पर भी साम्यवादी प्रभाव पड़ने लगा। इनमें जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, राम मनोहर लोहिया, नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन प्रमुख 1 अक्टूबर, 1934 में बंबई में कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना की गई। इससे पूर्व बिहार में 1931 में बिहार समाजवादी दल की स्थापना जयप्रकाश नारायण द्वारा किया जा चुका था ।

प्रश्न 13. चम्पारण सत्याग्रह का कारण लिखें तथा इस सत्याग्रह में गाँधीजी की भूमिका को लिखें ।

उत्तर ⇒ महात्मा गाँधी के सत्याग्रह का आरंभ चंपारण से शुरू हुआ । गाँधीजी ने इस आंदोलन में सत्य और अहिंसा को आधार बनाया था, इसलिए इसे चम्पारण सत्याग्रह भी कहा जाता है । चम्पारण में नील की खेती बहुत दिनों से होती थी । इस क्षेत्र में अंग्रेज बागान – मालिकों को जमीन की ठेकेदारी दी गई थी । इनलोगों ने इस क्षेत्र में ‘तीनकठिया प्रणाली’ लागू कर रखी थी। इसके अनुसार प्रत्येक किसान को अपनी खेती योग्य जमीन के 3/20 हिस्से या 15% हिस्से में नील की खेती करनी पड़ती थी जबकि किसान नील की खेती करना नहीं चाहते थे, क्योंकि इससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती थी । इतना ही नहीं, किसान अपना नील बाहर नहीं बेच सकता था, उन्हें बाजार से कम मूल्य पर बागान – मालिकों को ही नील बेचना पड़ता था । तीनकठिया व्यवस्था में 1908 में कुछ सुधार भी लाया गया, परन्तु इससे किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। जब जर्मनी के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम नीले रंग का उत्पादन शुरू कर दिया तब विश्व बाजार में भारतीय नील की माँग गिर गई। जब नील का मूल्य घटने लगा तब बागान – मालिकों ने इस क्षति की पूर्ति भी किसानों से ही करनी चाही । उनपर अनेक प्रकार के नए कर लगा दिये गये। अगर कोई किसान नील की खेती से मुक्त होना चाहता था तो उसके लिए आवश्यक था कि वह बागान – मालिक को एक बड़ी राशि शरबेशी या तवन (किश्त या लगान – वृद्धि) के रूप में दे । बागान – मालिकों के इस अत्याचार से चंपारण के किसान त्रस्त थे । 1916 में काँग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में चम्पारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी को चम्पारण आने और यहाँ के किसानों की दुर्दशा देखने के लिए आमंत्रित किया । गाँधीजी 1917 में चम्पारण आये । राजेन्द्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, ब्रजकिशोर प्रसाद, धरणीधर प्रसाद और गोरख प्रसाद के साथ गाँधीजी ने किसानों की दयनीय स्थिति की जाँच की। बड़ी संख्या में किसान गाँधीजी के पास बागान – मालिकों (निलहों) के अत्याचारों की शिकायत लेकर आये। सरकार गाँधीजी की लोकप्रियता से चिंतित हुई, उन्हें गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाया गया लेकिन शीघ्र ही उन्हें छोड़ दिया गया । गाँधीजी को किसी प्रकार के आंदोलन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, उन्हें केवल किसानों के कष्ट के बारे में जानकारी हासिल करने की स्वीकृति दी गई।
गाँधीजी के दबाव पर सरकार ने 1917 में एक जाँच समिति, ‘चम्पारण एग्रेरीयन कमेटी’ नियुक्त किया गया । गाँधीजी को भी इसका सदस्य बनाया गया । समिति की सिफारिशों के आधार पर ‘चम्पारण कृषि अधिनियम’ बना ।

इसके अनुसार –

(i) तिनकठिया – प्रणाली समाप्त कर दी गई तथा ( 1919 में) अन्य कई प्रकार के कर भी समाप्त कर दिये गये ।

(ii) बढ़ाये गये लगान की दरों में कमी की जाए तथा जो अवैध वसूली किसानों से की गई थी उसका 25% किसानों को लौटाया जाए । किसानों को इससे बहुत राहत मिली । किसानों में नई चेतना जगी और वे भी राष्ट्रीय आंदोलन को अपना समर्थन देने लगे ।

 

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