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Matric Geography Bharat Sansadhan Avam Upayog Subjective Questions 2024 [ भूगोल ] भारत संसाधन एवं उपयोग सब्जेक्टिव क्वेश्चन

भूगोल ( Geographyभारत संसाधन एवं उपयोग  दीर्घ उत्तरीय सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024:- हैलो दोस्तो अगर आप मैट्रिक परीक्षा 2024 के लिए तैयारी कर रहे है तो यहां पर क्लास 10th Geography भूगोल का महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर ( Class 10th Geography Long Type vvi Subjective Question Answer ) दिया गया है यहां पर क्लास 10th भूगोल 2024 का मॉडल पेपर ( Class 10th Geography Model Paper ) तथा ऑनलाइन टेस्ट ( Online Test ) भी दिया गया है और PDF डाउनलोड कर के भी पढ़ सकते हैं । और आप मैट्रिक के फाइनल एग्जाम में अच्छा मार्क्स ला सकते हैं और अपने भाविष्य को उज्वल बना सकते है धन्यवाद –

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Matric Geography Bharat Sansadhan Avam Upayog Subjective Questions 2024 [ भूगोल ] भारत संसाधन एवं उपयोग सब्जेक्टिव क्वेश्चन

प्रश्न 1 संसाधन के विकास में ‘सतत् विकास’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर ⇒ संसाधन मनुष्य की जीविका का आधार है। जीवन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए संसाधनों के सतत् विकास की अवधारणा अत्यावश्यक है। संसाधन प्रकृति प्रदत्त उपहार है। संसाधन को मानव ने इतना अंधाधुंध दोहन किया, जिसके कारण पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हो गयी है। व्यक्ति का लालच लिप्सा ने संसाधनों का तीव्रतम् दोहन कर संसाधनों के भंडार में चिंतनीय ह्रास ला दिया है। संसाधनों का विवेकहीन दोहन से विश्व पारिस्थितिकी में घोर संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। भूमंडलीय तापन, ओजोन क्षय, पर्यावरण प्रदूषण, मृदा-क्षरण, भूमि – विस्थापन, अम्लीय वर्षा, असमय ऋतु परिवर्तन जैसी पारिस्थितिकी संकट उत्पन्न हो गयी है। उपरोक्त परिस्थितियों से निजात पाते विश्वशांति के साथ जैव-जगत को गुणवत्तापूर्ण जीवन लौटाने के लिए सर्वप्रथम समाज में संसाधनों का न्याय संगत बँटवारा अपरिहार्य है। इससे पर्यावरण को बिना क्षति पहुँचाये, भविष्य की आवश्यकताओं के मद्देनजर, वर्तमान विकास को कायम रखा जा सके। ऐसी धारणा सतत् विकास कही जाती है जिसमें वर्त्तमान के विकास के साथ भविष्य सुरक्षित रह सकता है।

प्रश्न 2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ स्वामित्व के आधार पर संसाधन के चार प्रकार किये गये हैं –

(i) व्यक्तिगत संसाधन : ऐसे संसाधन जो किसी खास व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में होती है जिसके बदले में वे सरकार को लगान भी चुकाते हैं। जैसे- भूखण्ड, घर, जिस पर लोगों का निजी स्वामित्व होता है, बाग-बगीचा, तालाब, कुआँ इत्यादि । हैं ।

(ii) सामुदायिक संसाधन : ऐसे संसाधन किसी खास समुदाय के आधिपत्य में होता है जिसका उपयोग समूह तथा समाज के लिए सुलभ होता है। गाँव में पशु चराने भूमि, मंदिर या मस्जिद, तालाब, सामुदायिक भवन, शमशान आदि नगरीय क्षेत्र मैं इस प्रकार के संसाधन सार्वजनिक पार्क खेल मैदान, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा एवं गिरजाघर भी संसाधन संबंधित समुदाय के लिए सर्वसुलभ होते हैं ।

(iii) राष्ट्रीय संसाधन देश या राष्ट्र के अंतर्गत सभी उपलब्ध संसाधन राष्ट्रीय है। देश की सरकार को वैधानिक हक है कि वे व्यक्तिगत संसाधनों का अधिग्रहण आम जनता के हित में कर सकती है ।

(iv) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन : ऐसे संसाधनों का नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्था करती है। तट रेखा से 200km की दूरी छोड़कर खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का आधिपत्य नहीं होता है। ऐसे संसाधन का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से किसी राष्ट्र द्वारा किया जा सकता है ।

प्रश्न 3. मैदानी क्षेत्रों में मृदा अपरदन के कारण एवं रोकथाम के उपायों का वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ मैदानी क्षेत्रों में मृदा अपदान के प्रमुख कारण निम्न हैं –

(1) कृषि के अवैज्ञानिक ढंग को अपनाकर कृषक स्वयं मृदा अपरदन को बढ़ाता है ।

(ii) तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या की माँग को पूरा करने के लिए वनों का निर्ममतापूर्वक काटा जाना ।

(iii) अर्द्धशुष्क व चरागाह क्षेत्रों में भारी संख्या में भेड़-बकरी आदि पशुओं को पाला जाना आदि प्रमुख है । मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए निम्न उपाय करना आवश्यक है –

(i) बंजर भूमि और नदियों के किनारे वृक्षारोपण करना ।

(ii) फसलों का हेर-फेर और कुछ भूमि को थोड़े समय के लिए परती छोड़ना ।

(iii) बहते जल का वेग रोकने के लिए मेड़बन्दी करना ।

प्रश्न 4. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए ।

उत्तर ⇒ मृदा अपरदन एक विकट समस्या है, इसका संरक्षण हमारे लिए एक चुनौती है । किन्तु सृष्टि को अक्षुण्ण रखना है, इस चुनौती को स्वीकार करते हुए संरक्षण पर ध्यान देना आवश्यक है । मृदा संरक्षण के विविध तरीके हो सकते हैं जो मानवीय क्रियाकलापों द्वारा प्रयोग में लाये जा सकते हैं। फसल चक्रण द्वारा मृदा के पोषणीय स्तर को बरकरार रखा जा सकता है। गेहूँ, कपास, आलू, मक्का आदि के लगातार उगाने से मृदा में ह्रास उत्पन्न होता है । इसे तिलहन -दलहन पौधों की खेती द्वारा पुनर्प्राप्ति किया जा सकता है। इससे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च जुताई द्वारा मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। मृदा की सतत् गुणवत्ता बनी रहे, इसके लिए वर्षा जल का संचयन, भू-पृष्ठीय जल का संरक्षण, भूमिगत जल की पुर्नपूर्ति का प्रबंधन आवश्यक है । आधुनिक सिंचाई पद्धतियों को अपनाकर भी मृदा एवं जल दोनों को संरक्षित किया जा सकता है । रसायन का उचित उपयोग तथा वृक्षारोपण कर मृदा का संरक्षण किया जा सकता है । रसायनिक उर्वरक की जगह जैविक खाद का उपयोग मृदा के संरक्षण में सहायक है ।

प्रश्न 5. जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?

उत्तर ⇒ भूमि में अति सिंचाई से जलक्रांतता की समस्या उत्पन्न होती है जिससे मृदा में लवणीय और क्षारीय गुण बढ़ जाते हैं, जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी होते हैं
मृदा अपरदन मिट्टी के ऊपरी आवरण के कटाव और बहाव जैसी प्रक्रिया के कारण उत्पन्न होती है। जल जब ढलान की ओर बहता है तो मृदा धीरे-धीरे जल से घुलकर उसके साथ बह जाती है । इसे चादर अपरदन कहा जाता है। कई बार तेजी से बहने वाला जल नीचे की नरम मृदा को काटते – काटते गहरी नालियाँ बना देती है। इस प्रकार जलक्रांतता के द्वारा मिट्टी का ऊपरी परत अपरदित हो जाता है जिससे मृदा अपरदन की समस्या उत्पन्न होती है । मृदा अपरदन के कारक प्राकृतिक हो या मानवीय, उनका मृदा के उपजाऊपन पर बड़ा विनाशकारी प्रभाव पड़ता है, विशेषकर किसानों को बड़ी हानि होती है । फसल उगाने वाली उनकी सम्पन्नता स्वप्न बनकर रह जाती है ।

प्रश्न 6. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ भारत पशुओं की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारत का पशुपालन उद्योग काफी पिछड़ी अवस्था में है ।
भारत में विश्व का लगभग 16% गाय एवं बैल, 50% भैंस, 20% बकरी तथा 4% *भेड़ पाये जाते हैं। बावजूद इसके भारत की कुल कृषि उत्पाद में पशु उत्पाद का योगदान लगभग 25% ही है । देश के दूध उत्पादन में भैंस, गाय, बकरी का हिस्सा क्रमश: 50%, 46% तथा 4% है ।
भारतीय अर्थव्यवस्था में इसके योगदान की नगन्यता के कई कारण हैं- उष्ण जलवायु, अच्छी नस्ल का अभाव, चारे का अभाव, जीवन निर्वाह के रूप में पशुपालन को अपनाना, सामाजिक – धार्मिक मान्यताएँ एवं माँग कम होना आदि । देश में पशुओं के लिए स्थायी चारागृहों के लिए बहुत कम भूमि
( मात्र 4% ) उपलब्ध है, जो पशुधन के लिए पर्याप्त नहीं है । अतः, पशुपालन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

प्रश्न 7. जल संरक्षण से आप क्या समझते हैं ? इसके क्या उपाय हैं ?

उत्तर ⇒ जल संसाधन की सीमित आपूर्ति, तेजी से फैलते प्रदूषण एवं समय की माँग को देखते हुए जल संसाधनों का संरक्षण अपरिहार्य है । जिससे स्वस्थ जीवन, खाद्यान्न, सुरक्षा, आजीविका और उत्पादक अनुक्रियाओं को सुनिश्चित किया जा सके और नैसर्गिक परिवर्तनों के निम्नीकरण पर विराम लग सके ।

राष्ट्रीय जल नीति 2002 के अंतर्गत सरकार ने जल संरक्षण हेतु निम्न सिद्धांतों को ध्यान में रखकर योजनाओं को निर्मित किया गया है –

(i) जल की उपलब्धता को बनाये रखना ।

(ii) जल को प्रदूषित होने से बचाना।

(iii) प्रदूषित जल को स्वच्छ कर उसका पुनर्चक्रण ।

इसके निम्नलिखत उपाय हैं –

(i) भूमिगत जल की पुर्नपूर्ति: पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने जल मिशन के संदर्भ में भूमिगत जल पुर्नपूर्ति पर बल दिया था जिससे खेतों, गाँवों, शहरों, उद्योगों को पर्याप्त जल मिल सके। इसके लिए वृक्षारोपण, जैविक तथा कम्पोस्ट खाद के प्रयोग, वर्षा जल के संचयन मल-जल पुनः चक्रण जैसे क्रिया-कलाप उपयोगी हो सकते हैं ।

(ii) जल संभर प्रबंधन : जल जमाव का उपयोग कर उद्यान, कृषि, वानिकी, जल कृषि द्वारा कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इससे पेय जलापूर्ति भी की जा सकती है ।

(iii) तकनीकी विकास : ऐसे उपक्रम जिसमें जल का कम से कम उपयोग कर अधिकाधिक लाभ लिया जा सके ।

प्रश्न 8. वर्षा जल की मानव जीवन में क्या भूमिका है ? इसके संग्रहण व पुनः चक्रण के विधियों का उल्लेख करें ।

उत्तर ⇒ वर्षा जल की मानव-जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है- भारत कृषि प्रधान देश है यहाँ कृषि वर्षा पर आधारित है। भारतीयों को वर्षा पद्धति एवं मृदागुणों का गहरा ज्ञान था । उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों में वर्षा जल, भौम जल, नदी- जल, बाढ़ – जल के उपयोग के अनेक तरीके विकसित किये थे । वर्षा जल के द्वारा ही मानव कृषि कार्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। वर्षा जल द्वारा ही भूमिगत जल, वृक्ष, पेयजल, नदियों में जल की मात्रा होती है ।
राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षा जल का संग्रहण करते हैं । शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल को एकत्रित करने के लिए गड्ढे का निर्माण किया जाता है ताकि इससे मृदा को सिंचित कर खेती की जा सके । मेघालय के शिलांग में उन वर्षा का जल संग्रहण आज भी प्रचलित है ।
राजस्थान के जैसलमेर में खादीन तथा अन्य क्षेत्रों में जोहड़ के नाम से वर्षा जल एकत्रित को पुकारा जाता है। राजस्थान के ही जैसलमेर में पेयजल का संग्रह भूमिगत टैंक द्वारा किया जाता है। यह प्रायः आँगन में हुआ करता है । इसमें वर्षा जल का पानी छत पर संग्रहित जल को पाइप के द्वारा जोड़ दिया जाता है। कर्नाटक के मैसूर जिला में स्थित गंडाथुर गाँव में छत जल संग्रहण की व्यवस्था है । वर्त्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, सहित कई राज्यों में वर्षा जल संग्रहण कर पुनः चक्रण किया जाता है

प्रश्न 9. सोन नदी परियोजनाओं के बारे में लिखें ।

उत्तर ⇒ सोन नदी परियोजना बिहार की सबसे पुरानी एवं पहली सिंचाई परियोजना है। इसका विकास सिंचाई, कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया ।
इसका निर्माण 1874 ई. में किया गया। डेहरी के पास बाँध बनाकर सोन नदी के जल को रोका गया और पूरब एवं पश्चिम में दो नहर निकाल कर सिंचाई सुविधा प्रदान की गयी। पूरब की नहर से पटना, गया, औरंगाबाद जिलों में सिंचाई की जाती है। इस नहर तीन उप-शाखा का निर्माण हुआ। पहली शाखा आरा, भोजपुर जिलों को सिंचित करती है । दूसरी शाखा बक्सर जिले को सिंचित करती है । तीसरी शाखा का प्रभाव चौसा क्षेत्र है। डेहरी के 10km दूरी पर स्थित इन्द्रपुरी नामक स्थान पर बाँध बनाकर निर्माण किया गया। सोन नहर प्रणाली से यह क्षेत्र बिहार का सबसे सूखा प्रभावित क्षेत्र वर्त्तमान में चावल का कटोरा के नाम से जाना जाता है। इस परियोजना के अंतर्गत जल विद्युत शक्ति गृह पश्चिमी नहर के पास बनाया गया है। इसी प्रकार पूर्वी भाग में नामक स्थल में शक्ति गृह बनाये जाते हैं ।

प्रश्न 10. जैव विविधता क्या है ? यह मानव जीवन के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

उत्तर ⇒ जैव विविधता का अर्थ जैव विविधता में वन्य जीवन और प्रजातियों की अधिकता है। ये कार्य और रूप से भिन्न हैं, लेकिन पारस्परिक सामंजस्यता है । इस ग्रह पर लाखों प्राणियों के साथ हम रह रहे हैं। इसमें सूक्ष्म जीवाणु से लेकर हाथी और नीली ह्वेल सम्मिलित है । यह सम्पूर्ण निवास जिसमें हम रहते हैं जैव विभिन्नता है ।

महत्व –
(i) मनुष्य और सभी प्राणी मिलकर पारिस्थितिक तंत्र का मिश्रित जाल बनाते हैं जिसमें हम केवल एक अंग हैं जो इस तंत्र पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिये पौधे, जानवर और सूक्ष्म जीवाणु तथा वायु जिसमें हम साँस लेते हैं व जल जिसे हम पीते हैं तथा मृदा जो खाद्यान्न का उत्पादन करती है ।

(ii) पारिस्थितिक तंत्र में वनों का बहुत महत्त्व है। ये प्राथमिक उत्पादक जिन पर सभी प्राणी निर्भर हैं ।
पृथ्वी में जैव विविधता का भंडार है। हमारा देश जैव विविधता में विश्व के समृद्ध देशों में से एक है । इनकी गणना विश्व के 12 विशाल जैविक विविधता वाले देशों में की जाती है । यहाँ विश्व की सारी जैव उप-जातियों का 8% संख्या पायी जाती है। विश्व की एक लाख कीट पतंगों की जातियों में 60 हजार जातियाँ भारत में हैं। पादप बहुल देशों में भारत का 10वाँ स्थान है। भारत में 1693 मछलियां की प्रजाति पायी जाती है। हमारे देश में सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाला क्षेत्र पश्चिमी घाट और उत्तरी पूर्वी भारत है। विश्व के 25 हॉट स्पॉट में इन्हें भी रखा गया है। इनमें असंख्य प्रकार के जैविक समूह रहते हैं । यहाँ विश्व की सारी जैव-उपजातियों का 8% संख्या ( 16 लाख) पायी जाती है ।

प्रश्न 11. किस प्रकार मानवीय क्रियाएँ वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के ह्रास के लिए उत्तरदायी हैं ?

उत्तर ⇒ वनस्पति एवं जीव-जंतुओं के ह्रास के लिए उत्तरदायी मानवीय क्रियाएँ –

(i) औद्योगिक विकास, नगरीय आवास, बड़े बाँध और बड़ी परियोजनाएँ वन्य जीवों के स्वाभाविक निवास – जंगल, नदी, तालाब, निम्नतलीय जल जमाव के क्षेत्र (चँवर या चौर, टाल, वेटलैंड) इत्यादि को कम कर रहे हैं ।

(ii) प्रदूषण, अम्ल वर्षा, ग्रीन हाउस प्रभाव से उत्पन्न गर्मी इत्यादि से जीवों की प्रजनन शक्ति घट रही है। जीवन-चक्र पूरा न होने से उनकी नई संतानें या तो उत्पन्न नहीं हो पातीं या अल्पजीवी हो जा रही है ।

(iii) विभिन्न उपयोगों के लिए जीवों का शिकार गैरकानूनी तरीके से होता रहता है। जीवों का गुण ही उनके लिए काल बन जाता है। तुच्छ आर्थिक लाभ. के लिए उनकी बलि दी जा रही है, अर्थात् जीवों का शिकार उन् अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है ।

प्रश्न 12. वन संरक्षण क्यों आवश्यक है ? इसे आप किस प्रकार संरक्षित हरेंगे ?

उत्तर ⇒ देश में वनों के अनुरक्षण, संरक्षण और विकास के लिए राष्ट्रीय वन गीति के अनुसार वनों को संरक्षित करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रस्तुत हैं –

(i) कृषि के अयोग्य क्षेत्रों पर वृक्षारोपण करना ।

(ii) नदियों, झीलों और जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में वृक्षारोपण द्वारा मिट्टी के अपरदन पर रोक लगाना ।

(iii) वृहत् वनारोपण और सामाजिक वानिकी के कार्यक्रमों द्वारा वन आवरण क्षेत्र में वृद्धि करना ।

(iv) वन उत्पादों के कुशल उपयोग तथा लकड़ी के स्थान पर पूरक पदार्थों के उपयोग को बढ़ावा देना ताकि वर्तमान में विद्यमान वनों पर दबाव कम हो सके ।

प्रश्न 13. वनों का हमारे दैनिक जीवन में क्या महत्त्व है ? आप इसके रक्षण के लिए चार उपाय बतायें ।

उत्तर ⇒ वनों का हमारे दैनिक जीवन में बड़ा महत्त्व है। वनों से विविध प्रकार लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं, जो हमारे घरों और कार्यशालाओं को सुसज्जित करती वनों से प्राप्त जड़ों और पत्तियों से विविध औषधियाँ बनायी जाती हैं ।

वनों के संरक्षण के उपायों में –

(i) घरेलू ईंधन में लकड़ी के स्थान पर बायो गैस, सोलर कुकर व LPG आदि का प्रयोग करना ।

(ii) वनों की कटाई, घास की चराई व अन्य वृक्षों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना ।

(iii) इमारती लकड़ी के स्थान पर प्लास्टिक, फाइबर तथा स्टील का प्रयोग करना ।

(iv) नहरों, सड़कों एवं रेल मार्गों के किनारे-किनारे वनों की चौड़ी पट्टी बनाकर पुनः स्थापना करना आदि प्रमुख हैं ।

प्रश्न 14. भारतीय जैव मंडल क्षेत्र की चर्चा विस्तार से कीजिए ।

उत्तर ⇒ यूनेस्को के सहयोग से भारत में 14 जैव मंडल संरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है

प्रश्न 15. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिए और सभी वर्गों का वर्णन विस्तार से कीजिए ।

उत्तर ⇒ (1) अत्यंत सघन वन (कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों की घनत्व 70% से अधिक)
(2) सघन वन (वृक्षों की घनत्व 40-70%)
(3) खुले वन (10-40% वृक्षों की घनत्व)
(4) झाड़ियों एवं अन्य वन (वृक्षों का घनत्व 10% से कम)
(5) मैंग्रोव वन (तटीय वन) ।

(6) अत्यन्त सघन वन – भारत में इस प्रकार का वन विस्तार 54.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 1.66% है । असम एवं सिक्किम को छोड़कर समूचा पूर्वोत्तर राज्य इस वर्ग में आते हैं। इन क्षेत्रों में वनों का घनत्व 75% अधिक है

(7) सघन वन – इसके अंतर्गत 73.60 लाख हेक्टेयर भूमि आते हैं। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में इस प्रकार के वनों का विस्तार है । यहाँ वनों का घनत्व 62.99% है ।

(8) खुले वन – 2.59 करोड़ भूमि पर इस वर्ण के वनों का विस्तार है । कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा के कुछ जिले एवं असम जिलों में इस प्रकार के वनों का विस्तार हैं । इन जिलों में वृक्षों का घनत्त्व 23.89% है ।

(9) झाड़ियां एवं अन्य वन – राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्र में इस प्रकार के वन पाए जाते हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल के मैदानी भागों में वृक्षों का घनत्व 10% से भी कम है। इसके अंतगर्त 24.59% करोड़ हेक्टेयर भूमि आते हैं ।

(10) मैंगनीज वन – इस वन का विस्तार समुद्र तटीय राज्यों में फैला है । जिसमें आधा क्षेत्र पश्चिम बंगाल के सुंदर वन इसके बाद गुजरात अंडमान-निकोबार द्वीप समूह आते हैं। देश के 12 राज्यों, केन्द्रशासित प्रदेशों में मैग्रोव वन है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु आदि । देश के कुल 4.4 लाख हेक्टेयर भूमि में मैग्रीव वन है ।

 

प्रश्न 16. धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒

प्रश्न 17. अर्थव्यवस्था पर खनन कार्य के प्रभावों का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ अर्थव्यवस्था पर खनन कार्य का निम्न प्रभाव पड़ता है –

(i) इससे रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं ।

(ii) खनिजों के मिलने से उनके परिवहन के लिए सड़कें और रेलमार्ग बनाए जाते हैं। इस प्रकार आधारभूत संरचना की वृद्धि से उस क्षेत्र का आर्थिक विकास तेजी से होने लगता है ।

(iii) खनिजों के निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है ।

(iv) इससे औद्योगिक इकाइयों का विकास होता है ।

(v) खनिजों को पूरी तरह निकाल देने के बाद, इसके अभाव का सामना भी करना पड़ता है ।

(vi) खनन कार्य बन्द होने से बेरोजगारी की समस्या बढ़ने लगती है ।

प्रश्न 18. भारत में लौह-अयस्क के वितरण पर प्रकाश डालिए ।
अथवा, भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के वितरण का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ लौह-अयस्क महत्त्व – लौह-अयस्क एक आधारभूत अयस्क है तथा औद्योगिक विकास की रीढ़ की हड्डी है ।
भारत की स्थिति – भारत लौह-अयस्क में धनी है ।
राज्यवार इसका वितरण तथा इसकी गुणवत्ता – मैग्नेटाइट सबसे अच्छा लौह अयस्क है। इसमें 70% लौह अंश होता है । इसमें चुम्बकीय गुण होते हैं। विशेषकर विद्युत उद्योग में उपयोग होता है। हैमेटाइट अयस्क औद्योगिक लौह-अयस्क है। इसमें 50-60% लौह अंश पाया जाता है ।
वितरण

(i) उड़ीसा झारखंड पेटी उड़ीसा में उच्चकोटि का लौह-अयस्क बादाम पहाड़ी खानों में मयूरभंज और क्योंझर जिलों में पाया जाता है। झारखंड के सिंहभूम जिले में हेमेटाइट नोआमंडी खानों में पाया जाता है ।

(ii) दुर्ग- बस्तर-चन्द्रपुर पेटी – यह पेटी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में बैलाडीला खानों में हेमेटाइट उच्च कोटि का लौह-अयस्क पाया जाता है। इस श्रेणी में उच्च कोटि के 14 क्षेत्र हैं। इसमें सबसे अच्छे भौतिक गुण पाये जाते हैं। यह जापान, दक्षिण कोरिया को विशाखापत्तनम् पत्तन द्वारा भेजा जाता है ।

(iii) बेलारी-चित्रदुर्ग, चिकमंगलूर- तुमकुर पेटी — यह पेटी कर्नाटक के लौह-अयस्क के भंडार हैं। कुद्रेमुख खानें कर्नाटक के पश्चिम घाट में स्थित हैं। यहाँ से शत-प्रतिशत लोहा निर्यात किया जाता है। कुद्रेमुख विश्व का सबसे बड़ा लौह-अयस्क क्षेत्र है । अयस्क को पाइप लाइन द्वारा मंगलूर भेजा जाता है।

(iv) महाराष्ट्र-गोआ पेटी इसमें महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला और गोआ सम्मिलित है । यद्यपि यहाँ लौह-अयस्क उच्च कोटि का नहीं है लेकिन फिर भी इसे दक्षता से निकाला जाता है । लौह-अयस्क का निर्यात मारमगोआ बंदरगाह से किया ‘जाता है ।

प्रश्न 19. खनिजों के संरक्षण के उपाय सुझाइए ।

उत्तर ⇒ खनिज दहनशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है एवं इसके भंडार सीमित है । इनका पुनः निर्माण असंभव है। खनिज उद्योग का आधार है। किंतु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग इनके अस्तित्व के लिए संकट है
इसके संरक्षण के उपाय निम्नलिखित हैं-

(i) ऐसे प्रौद्योगिकी एवं शोध को विकसित किया जाए जो खनिजों के अपव्यय को रोक सकें ।

(ii) खनिज क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं के समुचित विकास किया जाए ।

(iii) संरक्षण नीति में पोषणीय खनन पर अत्यधिक बल दिया जाना चाहिए।

(iv) खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना ।

(v) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण उनका तथा कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज ।

(vi) खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों का बुद्धिमतापूर्वक उपयोग ।

प्रश्न 20. भारत के खनिज पट्टियों का नाम लिखकर किन्हीं दो का वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ भारत का अधिकांश खनिज निम्नलिखित चार पट्टियों में मिलती हैं-

(a) उत्तरी पूर्वी पठार

(b) दक्षिणी-पश्चिमी पठार

(c) उत्तर-पश्चिम प्रदेश

(d) हिमालय

(a) उत्तरी-पूर्वी पठार – यह देश की सबसे धनी खनिज पेटी है जिसमें छोटानागपुर का पठार, उड़ीसा का पठार, छत्तीसगढ़ का पठार तथा पूर्वी भारत का पठार अवस्थित है । इस पेटी में लौह-अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइड, यूरेनियम, चूना पत्थर, ताँबा, थोरियम, डोलोमाइट, क्रोमियम, फॉस्फेट के विशाल भंडार हैं ।

(b) दक्षिणी-पश्चिमी पठार – यह पेटी कर्नाटक के पठार एवं निकटवर्ती तमिलनाडु के पठार पर फैला हुआ है यहाँ लौह-अयस्क, मैंगनीज, बॉक्साइट आदि भारी मात्रा में पाये जाते हैं। देश की सभी तीनों सोने की खाने इसी पेटी में मौजूद हैं ।

प्रश्न 21. लौह-अयस्क का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को लिखिए ।

उत्तर ⇒ लौह-अयस्क को चार भागों में बाँटा गया है–

(i) हेमेटाइट – इसमें लोहे की मात्रा 50-70% तक होती है यह आग्नेय चट्टान में मिलता है ये लाल-भूरे रंग का होता है ।

(ii) मैग्नेटाइट इसका रंग काला होता है इसमें लोहे की मात्रा 72% तक होता है यह सर्वोच्च किस्म का लोहा होता है ।

(iii) लिमोनाइट इसका रंग पीला होता है, इसमें लोहे की मात्रा 10-40% तक होता है ।

(iv) सिडेराइट इसका रंग भूरा होता है इसमें लोहे की मात्रा 48% तक होता है । लौह अयस्क एक आधारभूत अयस्क है तथा औद्योगिक विकास की रीढ़ की हड्डी है। भारत लौह अयस्क में धनी है। मैग्नेटाइट सबसे अच्छा लौह अयस्क है 4 इसमें 70% लौह अंश होता है इसमें चुम्कीय गुण होता है ।
अतः, विशेषकर विद्युत उद्योग में उपयोग होता है। हेमेटाइट अयस्क औद्योगिक लौह अयस्क हैं इसमें 60.9% लौह अंश पाया जाता है ।

प्रश्न 22. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालिए ।

उत्तर ⇒ अभ्रक यह लचीला तथा तापरोधी होता है। इसका उपयोग बिजली के मोटर, डायनेमो, हवाई जहाज, धमन भट्टी, लालटेन के चिमनी, सजावट के समान, आयुर्वेदिक दवाएँ आदि में है ।
वितरण- भारत विश्व में अभ्रक का सर्वप्रमुख उत्पादक देश है। भारत में अभ्रक के कुल भंडार 59890 मीट्रिक टन हैं। मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, झारखण्ड, राजस्थान, बिहार में होती है ।

(i) आंध्र प्रदेश देश का अभ्रक भंडार एवं उत्पादन में प्रथम स्थान है। यहाँ नेल्लौर जिला, कृष्णा, विशाखापत्तनम् जिलों में मिलता है ।

(ii) राजस्थान – यह उत्पादन में दूसरा स्थान है। जयपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर आदि जिलों में मिलता है ।

(iii) झारखण्ड – देश के उत्पादन में तीसरा स्थान है। यहाँ कोडरमा, हजारीबाग, गिरीडीह, धनबाद जिले में मिलता है

(iv) बिहार —यहाँ गया, मुंगेर, भागलपुर, नवादा जिलों में मिलता है ।

प्रश्न 23. खनिज कितने प्रकार के होते हैं ? प्रत्येक का सोदाहरण परिचय दीजिए ।

उत्तर ⇒ सामान्यत: खनिज दो प्रकार के होते हैं-

(i) धात्विक खनिज इन खनिजों में धातु होता है इसमें लौह-अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि ।
इसे भी दो भागों में बाँटा जाता है-

(a) लौह युक्त खनिज – जिन धातुओं खनिजों में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है । जैसे- लौह-अयस्क, मैंगनीज, निकेल, टंगस्टन आदि ।

(b) अलौह युक्त खनिज – जिन धात्विक खनिजों में लोहे का अंश कम होता है। जैसे- सोना, चाँदी, सीसा, टिन, ताँबा आदि ।

(ii) अधात्विक खनिज — इसमें धातु नहीं होते हैं जैसे- चूना पत्थर, डोलोमाइट, अभ्रक, जिप्सम आदि ।अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-

(a) कार्बनिक खनिज- इसमें जीवाशम होते हैं ये पृथ्वी में एवं पादप जीवों के परिवर्तित होने से बनते हैं। जैसे- कोयला, खजिन तेल ।

(b) आकर्बनिक खनिज —- इनमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट ।

प्रश्न 24. मैंगनीज और बॉक्साइट की उपयोगिता तथा देश में इनका वितरण का वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ मैंगनीजयह एक महत्त्वपूर्ण खनिज है जो लोहा तथा इस्पात निर्माण में प्रयोग किया जाता है और यह. एक आधारभूत कच्चा माल है जो मिश्रित धातु के बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, रंग तथा बैट्री में किया जाता है । मैंगनीज देश में मुख्यत: उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक,
आंध्र प्रदेश, इसके अलावे छत्तीसगढ़, गुजरात में मिलता है ।

(i) उड़ीसा देश के उत्पादन में प्रथम स्थान है यहाँ मैंगनीज क्योंझर, कालाहाड़ी, बोलनगिरि, देकानाग, सुंदरगढ़, गंग्य जिलों में मिलता है ।

(ii) महाराष्ट्र देश में मैंगनीज उत्पादन में दूसरा स्थान है यहाँ मुख्य रूप से नागपुर एवं भंडारा जिलों में है । रत्नागिरी में सर्वोत्तम किस्म का मैंगनीज उत्पादन होता है ।

(iii) मध्यप्रदेश देश का तीसरा बड़ा उत्पादक राज्य है । बालाघाट, छींदवाड़ा जिलों में मुख्य रूप से उत्पादन होता है ।

(iv) कर्नाटक यहाँ में बेल्लारी, चित्रदुर्ग, धारवाड़, संदूर और सिमोगा जिलों में ।
बॉक्साइट
बॉक्साइट का उपयोग ऐलुमिनियम धातु, वायुयान निर्माण, विद्युत उपकरण, बर्त्तन, घरेलू समान, रासायनिक वस्तुएँ आदि बनाये जाते हैं यह एल्युमिनियम का ऑक्साइड है यह एक अलौह धातु है ।
वितरण- बॉक्साइट भारत में अनेक क्षेत्रों में मिलता है लेकिन मुख्य रूप से उड़ीसा, गुजरात, झारखण्ड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश में पाये जाते हैं

(i) उड़ीसा – देश का लगभग 55.29% बॉक्साइट का भंडार उड़ीसा राज्य में है । उड़ीसा के उत्पादन देश में प्रथम है यहाँ कालाहाड़ी, सबलपुर, रायगढ़, कोरापुर, नीलगिरी, सुंदरगढ़ जिलों में मुख्य रूप से हैं

(ii) गुजरात — देश का दूसरा उत्पादक राज्य है यहाँ खेड़ा, जामनगर, जूनागढ़, कच्छू, अमरैली भावनगर, सूरत आदि जिलों में मिलता है ।

(iii) झारखण्ड – यहाँ मुख्य रूप से लोहरदग्गा, नेतरहाट, पठार (पलामू) ।

(iv) महाराष्ट्र – कोलावा, सतारा, कोल्हापुर रत्नागिरि आदि जिलों में बॉक्साइट मिलता है ।

(v) छत्तीसगढ़ – यहाँ बॉक्साइट अमरकंटक पठार, रायगढ़, विलासपुर जिलों में मुख्य रूप से मिलते हैं ।

(vi) अन्य राज्य — कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश में भी पाये जाते

 

प्रश्न 25. शक्ति संसाधनों के संरक्षण की दिशा में उठाये गये प्रयासों का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर ⇒ ऊर्जा संकट एक विश्वव्यापी समस्या का रूप ले चुका है। इस परिस्थिति में संरक्षण हेतु अनेक प्रयास किये जा रहे हैं-

(i) ऊर्जा के प्रयोग में मितव्ययिता ऊर्जा संकट से बचने के लिए प्रथमतः ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता बरती जाए। इसके लिए तकनीकी विकास आवश्यक । ऐसे मोटर गाड़ियों का निर्माण भी कम तेल में ज्यादा चलते हैं। अनावश्यक बिजली का उपयोग, पर रोक कर हम ऊर्जा की बड़ी मात्रा का बचत कर सकते हैं ।

(ii) ऊर्जा के नवीन वैकल्पिक साधनों का उपयोग—वैकल्पिक ऊर्जा में पारम्परिक एवं गैर पारम्परिक दोनों ऊर्जा है । इनमें से कुछ सतत् नवीकरणीय है तो कुछ समापतीय है। वैकल्पिक ऊर्जा में जल-विद्युत, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा,
सौर ऊर्जा आदि का विकास कर शक्ति के साधनों को संरक्षित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम होगा। अतः, इसके स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग अपरिहार्य हो गया है।

(iii) ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज ऊर्जा संकट सामाधान की दिशा में परम्परागत ऊर्जा के नए क्षेत्रों का अन्वेषण किया जाए । अरब सागर, गोदावरी, कृष्णा क्षेत्र, राजस्थान क्षेत्र आदि में पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस के क्षेत्र प्राप्त हुए हैं । इसके लिए सुदूर संवेदी सूचना प्रणाली का भी उपयोग हो रहा है ।

प्रश्न 26. शक्ति संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए ।
अथवा, शक्ति संसाधन का वर्गीकरण विभिन्न आधारों के अनुसार सोदाहरण स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर ⇒ शक्ति संसाधन के वर्गीकरण के विविध आधार निम्नलिखित हैं-

(a) – उपयोग स्तर के आधार पर शक्ति संसाधन दो प्रकार के हैं-

(i) सतत् शक्ति- सौर किरणें, भूमिगत ऊष्मा, पवन, प्रवाहित जल आदि ।

(ii) समापनीय शक्ति कोयला पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस एवं विखण्डनीय तत्त्व आदि ।

(b) उपयोगिता के आधार पर शक्ति संसाधन दो भागों में विभक्त किया

(i) प्राथमिक ऊर्जा कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा रेडियोधर्मी खनिज आदि ।

(ii) गौण ऊर्जा – विद्युत ।

(c) स्रोतों की स्थिति के आधार पर शक्ति को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता

(i) दहनशील शक्ति संसाधन कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आण्विक खनिज |

(ii) अदहनशील शक्ति संसाधन प्रवाही जल, पवन, लहरें,सौर शक्ति ।

(d) शक्ति के स्रोतों की समय के आधार पर पारम्परिक तथा गैर- पारम्परिक शक्ति संसाधन

(i) पारम्परिक शक्ति कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस ।

(ii) गैर-पारम्परिक शक्ति सूर्य, पवन, ज्वार, परमाणु ऊर्जा, गर्म झरने |

प्रश्न 27. कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर ⇒ कोयले के प्रकार (वर्गीकरण) इस प्रकार हैं-
(i) लिग्नाइट यह निम्न कोटि का भूरा कोयला होता है। इसके भंडार नेवेली (तमिलनाडु) में पाये जाते हैं। इसका उपयोग विद्युत बनाने में किया जाता है।

(ii) बिटुमिनस कोयला जो अधिक गहराई पर दबा हुआ है बिटुमिनस कोयला है । यह वाणिज्यिक कार्यों के लिए अधिक लोकप्रिय है। यह मध्यम कोटि का कोयला है ।

(iii) एन्थ्रासाइट- यह उच्च कोटि का कठोर कोयला है।

(iv) भारत में कोयले के पृष्ठभूमि-कोयला भारत में दो भू-गर्भिक श्रेणियों में पाया जाता है — गोंडवाना जो 200 मिलियन वर्ष पुराने हैं तथा टरशरी जो 55 मिलियन वर्ष पुराने हैं। गोंडवाना कोयला के प्रमुख भंडार दामोदर घाटी, पश्चिम बंगाल (रानीगंज) में स्थित हैं। झारखंड झरिया, बोकारो आदि महत्त्वपूर्ण कोयला क्षेत्र हैं ।
गोदावरी – महानदी सोन और वर्धा घाटी में भी पाया जाता है

(v) टरशरी कोयला – यह मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में पाया जाता है। कोयला भारी पदार्थ है, परन्तु जलने में वजन कम हो जाता है और राख में बदल जाता है । इसलिए भारी उद्योग में ताप विद्युत बनाने में प्रयोग किया जाता है ।

कोयले के निम्न विशेषताएँ हैं–

(i) भारत में कोयला सबसे अधिक पाये जाने वाला जैविक ईंधन है। यह देश की ऊर्जा आवश्यकता को सबसे अधिक पूरा करता है। यह ऊर्जा उत्पादन तथा घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है 1
(ii) कोयले का निर्माण लाखों वर्ष पहले हुआ था । कोयला कई रूपों में पाया जाता है। यह इस बात पर निर्भर है कि कोयला कितनी गहराई पर दाब तथा तापमान पर दबा हुआ है। पेड़-पौधे के अपशिष्ट जो दलदल में दबे ‘हुए थे, इसे पीट कहते हैं । इसमें कम कार्बन होता है तथा कम ताप क्षमता होती है ।

प्रश्न 28. भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ भारत में मुख्यतः पाँच तेल उत्पादक क्षेत्र हे-

(i) उत्तरी-पूर्वी प्रदेश- देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है । ऊपरी असम घाटी, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड में मिलते हैं इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उत्पादक असम में दिग्बोई, डिग्बोई, नहरकटिया, मोरान, रूद्रसागर है। अरुणाचल प्रदेश, निगरू, नागालैंड के बोरहोला तेल क्षेत्र ।

(ii) गुजरात क्षेत्र-खम्भात बेसिन, अंकलेश्वर कलोला, नवगांव, कोशाम्बा ।

(iii) मुंबई हाई- मुंबई तट से 176 km दूर उत्तर-पश्चिम अरब सागर में।

(iv) पूर्वी तट प्रदेश कृष्णा, गोदावरी, कावेरी नदियों की श्रेणियों में ।

(v) बारमेर श्रेणी-मंगला क्षेत्र ।

प्रश्न 29. जल-विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों की विवेचना कीजिए ।

उत्तर ⇒ जल एक उदाह्यशील नवीकरणीय संसाधन है। इससे उत्पन्न जल-विद्युत शक्ति प्रदूषण मुक्त होती है। जलविद्युत उत्पादन के लिए सदावाहिनी नदी में प्रचुर जल की राशि, नदी मार्ग में ढाल, जल का तीव्र वेग, प्राकृतिक जलप्रपात का होना इत्यादी भौतिक दशाएँ हैं।
जो पर्वतीय एवं हिमानीकृत क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके उत्पादन के लिए आर्थिक दशाएँ जैसे-सघन औद्योगिक क्षेत्र वाणिज्यिक एवं सघन आबाद क्षेत्रों जैसा बाजार पर्याप्त पूँजी निवेश परिवहन के साधन प्रौद्योगिकी ज्ञान एवं ऊर्जा के अन्य स्रोतों का अभाव प्रमुख है |

प्रश्न 30. भारत के किन्हीं चार परमाणु विद्युत गृह का उल्लेख कीजिए तथा उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर ⇒ (i) तारापुरा परमाणु विद्युत गृह यह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है। यहाँ जल उबालने वाली दो परमाणु भट्टियाँ हैं जिसमें प्रत्येक की उत्पादन क्षमता. 200 मेगावाट से अधिक है ।
अब यहाँ यूरेनियम के स्थान पर थोरियम से प्लेटेनियम बनाकर विद्युत उत्पन्न किये जा रहे हैं क्योंकि भारत थोरियम के भण्डार में काफी समृद्ध है।

(ii) राणाप्रताप सागर परमाणु विद्युत गृह — यह राजस्थान के कोटा में स्थापित है। यह चंबल नदी के किनारे है जिससे जल प्राप्त होता है। यह बिजली घर कनाडा के सहयोग से बना है। इसका उत्पादन क्षमता 100 मेगावाट है। फिलहाल में 235 मेगावाट की दो नई इकाइयों की शुरूआत हुई है। विद्युत-गृह-

(iii) कलपक्कम परमाणु विद्युत गृह — तमिलनाडु में स्थित यह परमाणु विद्युत गृह स्वदेशी प्रयास से बना है। यहाँ 335 मेगावाट की दो रिएक्टर क्रमशः 1983 एवं 1985 में कार्य करना शुरू कर चुका है 1

(iv) नरौरा परमाणु विद्युत गृह — यह उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के पास स्थित है । यहाँ भी 235 मेगावाट की दो रिएक्टर है ।

प्रश्न 31. भारत में पारम्परिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण प्रस्तुत कीजिए ।

उत्तर ⇒ कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस जैसे खनिज ईंधन आदि ये पारम्परिक शक्ति संसाधन है तथा ये समाप्य संसाधन है ।
कोयला- भारत विश्व उत्पादन में तीसरा स्थान है ।
1 जनवरी, 2008 तक 1200 km की गहराई तक कोयले का अनुमानित भंडार 26454 करोड़ टन आँका गया था । यहाँ कोयला भंडार दो मुख्य भागों में है ।

(i) गोंडवाना समूह — भारत के 96% कोयला भंडार इस समूह के हैं तथा भारत के कुल उत्पादन का 99% भाग प्राप्त होता है । गोंडवाना कोयला क्षेत्र चार नदियों में पाये जाते हैं— (क) दामोदर घाटी (ख) सोन घाटी (ग) महानदी घाटी (घ) वर्धा – गोदावरी घाटी ।

(ii) टर्शियरी समूह — टर्शियरी मुख्यतः असम, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, . और तमिलनाडु में मिलता है। गोंडवाना समूह का कोयला झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश में मिलता है।
पेट्रोलियम — भारत में विश्व का मात्र 1% पेट्रोलियम का उत्पादन होता है इनके प्रमुख क्षेत्र – असम, गुजरात, बम्बई, गोदावरी, कृष्णा घाटी एवं वारमेर बेसिन आदि । प्राकृतिक गैस-प्राकृतिक गैस की संचित राशि 700 अरब घन मीटर है । 2004-05 में उत्पादन 3082 घन मीटर है ।
प्रायः पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र ही प्राकृतिक गैस के उत्पादक हैं ।

प्रश्न 32. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखिए :
भाखड़ा नांगल परियोजना दामोदर घाटी परियोजना, कोसी परियोजना, हीराकुण्ड परियोजना, रिहन्द परियोजना और तुंगभद्रा परियोजना ।

उत्तर ⇒ (i) भाखड़ा नंगल परियोजना- सतलज नदी पर हिमालय प्रदेश में विश्व के सर्वोच्च बाँधों में एक है । भाखड़ा बाँध की ऊँचाई 225 मीटर है। यह भारत की सबसे बड़ी परियोजना है जहाँ चार शक्ति गृह एक भाखड़ा में दो गंगुवात में और एक स्थापित होकर 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न कर पंजाब, हरियाणा,
दिल्ली, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा जम्मू-कश्मीर राज्यों में कृषि एवं उद्योगों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है।

(ii) दामोदर घाटी परियोजना – यह परियोजना दामोदर नदी के भयंकर बाढ़ से झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल को बचाने के साथ-साथ तिलैया, मैथन, कोनार और पंचेत पहाड़ी में बाँध बनाकर 1300 मेगावाट जल विद्युत उत्पन्न करने में सहायक है । इसका लाभ बिहार, झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल को प्राप्त है ।

(iii) कोसी परियोजना- उत्तर बिहार का अभिशाप कोशी नदी पर हनुमान नगर (नेपाल) में बाँध बनाकर 20000 किलोवाट बिजली उत्पन्न किया जा रहा है जिसकी आधी बिजली नेपाल को तथा शेष बिहार को प्राप्त होती है ।

(iv) रिहन्द परियोजना — सोन की सहायक नदी रिहन्द पर उत्तर प्रदेश में 934 मीटर लम्बा बाँध और कृत्रिम झील ‘गोविन्द बल्लभ पंत सागर’ का निर्माण कर बिजली उत्पादित की जाती है। इस योजना से 30 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता है। यहाँ के बिजली का उपयोग रेणुकूट के एल्युमिनियम उद्योग,
चुर्क के सीमेंट उद्योग, मध्य भारत के रेल मार्गों को विद्युतीकरण तथा हजारों नलकूपों के लिए किये जाते हैं ।

(v) हीराकुण्ड परियोजना महानदी पर उड़ीसा में विश्व का सबसे लम्बा बाँध (4801 मीटर) बनाकर 2.7 लाख किलोवाट बिजली उत्पन्न होता है। इससे उड़ीसा एवं आस-पास के क्षेत्र के कृषि एवं उद्योग में उपयोग किया जाता है ।

(vi) चम्बल घाटी परियोजना चम्बल नदी पर राजस्थान में तीन बाँध गाँधी सागर, राणाप्रताप सागर और कोटा में तीन शक्ति गृह की स्थापना कर 2 लाख मेगावाट बिजली उत्पन्न किया जा रहा है। इससे राजस्थान एवं मध्य प्रदेश को लाभ मिलता है ।

(vii) तुंगभद्रा परियोजना यह कृष्णा नदी की सहायक नदी तुंगभद्रा पर आन्ध्र प्रदेश में अवस्थित दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है, जो कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश के सहयोग से तैयार हुआ है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 1 लाख किलोवाट है जो सिंचाई के साथ-साथ छोटे-बड़े उद्योगों को बिजली आपूर्ति करता है ।

प्रश्न 33. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखिए :
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायोगैस एवं ज्वारीय ऊर्जा ।

उत्तर ⇒ सौर ऊर्जा सूर्य के ताप से प्राप्त ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं। भारत में सौर ऊर्जा प्राप्त करने की संभावनाएँ बहुत व्यापक है । फोटो वोल्टाईक प्रौद्योगिकी सूर्य प्रकाश को सीधे विद्युत में बदलती है । भारत का सबसे बड़ा सौर्य संयंत्र भुज के पास माधोपुर में स्थापित किया गया
यह सामान्य हीटर, कुलर, प्रकाश और उपकरणों में अधिक उपयोग की जाती है। यह कम लागत वाला पर्यावरण के अनुकूल तथा निर्माण में होने के कारण अन्य ऊर्जा के स्रोतों की अपेक्षा ज्यादा लाभदायक है । क्षार मरुस्थल देश में सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा केन्द्र बन सकता है ।
पवन ऊर्जा – पवन ऊर्जा के उत्पादन में भारत विश्व में पाँचवा स्थान है। देश का सबसे बड़ा पवन कार्य तमिलनाडु मुत्पनडल में है । भारत में पवन ऊर्जा की कुल संभावित क्षमता 50,000 मेगावाट आँकी गयी है। 31 मार्च 2006 तक देश में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 5300 मेगावाट है।
एशिया का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा गुजरात के कुछ जिले के लांबा में मांडली है
पवन ऊर्जा पवन चक्कियों की सहायता से प्राप्त की जाती है । पवन चक्की पवन की गति से चलती है और टारवाइन को चलाती है। इससे गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान है ।
भूतापीय ऊर्जा-यह ऊर्जा पृथ्वी के उच्च ताप से प्राप्त किया जाता | जब भूगर्भ से मैग्मा निकलता है तो अपार ऊर्जा मुक्त होता है। गीजर कूपों से निकलने वाले गर्म जल तथा गर्म झरने से भी शक्ति प्राप्त किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के मणिकरण में भूतापीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित हैं तथा
दूसरा लद्दाख में पुरर्गाघाटी में स्थित है ।
बायोगैस ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि अपशिष्ट पशुओं और मानव जनित के उपयोग से घरेलू उपयोग हेतु बायोगैस उत्पन्न की जाती है। जैविक पदार्थों के अपघटन से गैस उत्पन्न होती है। पशुओं के गोबर से गैस तैयार करने वाले संयंत्र को भारत में गोबर गैस प्लांट के नाम से जाना जाता है ।
इससे किसानों को ऊर्जा तथा उर्वरक की प्राप्ति होती है ।
ज्वारीय ऊर्जा-समुद्री ज्वार में जल गतिशील होता है । अतः इसमें अपार ऊर्जा रहती है । भारत में समुद्री ज्वार से 40,000 मेगावाट विद्युत के उत्पादन की क्षमता
है है । यद्यपि देश के तट रेखा की लम्बाई 6100 km है । परन्तु, ज्वार ऊर्जा के उत्पादन की संभावनाएँ कम है । खम्भात की खाड़ी सबसे अनुकूल है। इसके अलावे हुगली ज्वारनदमुख सुंदरवन इसके लिए अनुकूल हैं ।

प्रश्न 34. वन एवं वन्य जीवों के महत्त्व का विस्तार से वर्णन कीजिए

उत्तर ⇒ वन एवं वन्य जीव मानव जीवन के प्रमुख हमसफर हैं। वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच है। वन उस बड़े भू-भाग को कहते हैं जो पेड़-पौधे झाड़ियों द्वारा आच्छादित होते हैं। वन जैव विविधताओं का आवास होती है। यह केवल एक संसाधन ही नहीं बल्कि पारिस्थैतिक तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण घटक हैं। हमारा इनसे अटूट संबंध है। वन प्रकृति का एक अमूल्य धरोहर है। वन एवं वन्य प्राणी मानव के लिए प्रतिस्थापित होने वाला संसाधन है । यह इस जीव- मंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति में जीने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है क्योंकि सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति होता है। भारत में वन संसाधन एक महत्वपूर्ण संसाधन है। वर्तमान समय के विकास की दौड़ में हम ने अपने अतीत के सभी गौरवशाली परम्पराओं को नाकार दिया है। वन एवं वन्य प्राणी के महत्त्व को नहीं समझ रहे हैं और तेजी से इस संसाधन का विदोहन कर रहे हैं। वस्तुतः, हमें वन और वन्य जीव संसाधनों को संरक्षण देना चाहिए

 

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