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Class 10th Hindi Grammar Varn Vichar Subjective and Objective Questions [ हिंदी व्याकरण ] वर्ण विचार सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन
Class 10th Civics Subjective Question Answer Class 10th Subjective Question

Matric Civics Lokatantr me Satta Ki Sajhedari Subjective Questions 2024 [ नागरिक शास्त्र ] लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024

नागरिक शास्त्र ( Civics) लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी लघु और दीर्घ  उत्तरीय सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024:- हैलो दोस्तो अगर आप मैट्रिक परीक्षा 2024 के लिए तैयारी कर रहे है तो यहां पर क्लास 10th Civics नागरिक शास्त्र का महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर ( Class 10th Civics Short Type vvi Subjective Question Answer ) दिया गया है यहां पर क्लास 10th नागरिक शास्त्र 2024 का मॉडल पेपर ( Class 10th Civics Model Paper ) तथा ऑनलाइन टेस्ट ( Online Test ) भी दिया गया है और PDF डाउनलोड कर के भी पढ़ सकते हैं । और आप मैट्रिक के फाइनल एग्जाम में अच्छा मार्क्स ला सकते हैं और अपने भाविष्य को उज्वल बना सकते है धन्यवाद –

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( Civics ) का कृषि लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर

                                       लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ? अथवा, धर्म – निरपेक्षता की अवधारणा का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर ⇒ धर्म-निरपेक्षता के अंतर्गत संविधान सभी नागरिकों को किसी भी धर्म का पालन करने एवं उसका प्रचार करने की आजादी देता है। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता, न ही राज्य किसी धर्म का संपोषण या समर्थन कर सकता है ।

प्रश्न 2. लैंगिक विभेद से क्या अभिप्राय है ?
अथवा, लैंगिक असमानता क्या है ?

उत्तर ⇒ लिंग के आधार पर समाज में महिलाओं व पुरुषों में जो असमानता पायी जाती है, उसे लैंगिक असमानता / लैंगिक विभेद कहते हैं। यह असमानता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व अन्य क्षेत्रों में पाई जाती है।

प्रश्न 3. धर्म निरपेक्ष राज्य से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ वैसा राज्य जिसमें किसी भी धर्म विशेष को प्राथमिकता न देकर सभी धर्मों को समान आदर प्राप्त हो उसे धर्म-निरपेक्ष राज्य कहते हैं। जैसे भारत ।

प्रश्न 4. साम्प्रदायिकता की परिभाषा दें

उत्तर ⇒ जब हम यह कहते हैं कि धर्म ही समुदाय का निर्माण करती है तो साम्प्रदायिक राजनीति का जन्म होता है और इस अवधारणा पर आधारित सोच ही साम्प्रदायिकता है। इसके अनुसार एक धर्म विशेष में आस्था रखनेवाले एक ही समुदाय के होते हैं और उनके मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण हित एक जैसे होते हैं ।

प्रश्न 5. साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये आप क्या करेंगे ?

उत्तर ⇒ भारत में विभिन्न धर्मों के लोग निवास करते हैं । धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति के कारण साम्प्रदायिक सद्भाव के स्थान पर साम्प्रदायिक संघर्ष का जन्म होता है। साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए शिक्षा व जागरुकता का विकास, विभिन्न धर्म के लोगों में आपसी समझ का विकास तथा धर्म के राजनीतिक उपयोग पर रोक लगाना आवश्यक है।

प्रश्न 6 सामाजिक विभाजन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ प्रत्येक समाज में लोगों के जन्म, भाषा, जाति, धर्म के आधार पर विभेद होना स्वाभाविक है। इन आधारों पर लोग अलग-अलग समुदायों से संबद्ध हो जाते हैं तो उसे सामाजिक विभाजन कहा जाता है। भारत में जाति के आधार पर सवर्ण, दलित, पिछड़ी जातियों के समुदाय सामाजिक विभाजन के उदाहरण हैं ।

प्रश्न 7. लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ किस प्रकार अनेक तरह के सामाजिक विभाजनों को संभालती हैं ? उदाहरण के साथ बतावें ।

उत्तर ⇒ समानता और स्वतंत्रता, लोकतंत्र के दो आधार हैं। समानता का सिद्धांत जाति, धर्म, वंश, लिंग, भाषा क्षेत्र जैसे किसी भी आधार पर व्यक्ति के विभेद को अस्वीकार करता है। इसकी जगह कानून के समक्ष समानता, समान अवसर, समान संरक्षा की स्थापना करता है। स्वतंत्रता के अंतर्गत सभी व्यक्तियों को समान स्वतंत्रता प्रदान की जाती है जिसमें भाषण एवं अभिव्यक्ति, संघ-संगठन बनाने, पेशा व्यवसाय चुनने, मताधिकार आदि शामिल हैं ।

प्रश्न 8. भारत की संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है ?

उत्तर ⇒ यद्यपि मनुष्य जाति की आबादी में महिलाओं की संख्या आधी है, पर सार्वजनिक जीवन में खासकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य है । पहले सिर्फ पुरुष वर्ग को ही सार्वजनिक मामलों में भागीदारी करने, वोट देने या सार्वजनिक पदों के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति थी । सार्वजनिक जीवन में हिस्सेदारी हेतु महिलाओं को काफी मेहनत करनी पड़ी। महिलाओं के प्रति समाज के घटिया सोच के कारण ही महिला आंदोलन की शुरुआत हुई। महिला आंदोलन की मुख्य माँगों में सत्ता में भागीदारी की माँग सर्वोपरि रही है । औरतों ने सोचना शुरू कर दिया कि जब तक औरतों का सत्ता पर नियंत्रण नहीं होगा तब तक इस समस्या का निपटारा नहीं होगा । फलतः, राजनीतिक गलियारों में इस बात पर बहस छिड़ गयी कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने का उत्तम तरीका यह होगा कि चुने हुए प्रतिनिधि की हिस्सेदारी बढ़ायी जाए। यद्यपि भारत के लोक सभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 59 हो गई है। फिर भी इसका प्रतिशत 11% के नीचे ही है । आज भी आम परिवार के महिलाओं को सांसद या विधायक बनने का अवसर क्षीण है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना लोकतंत्र के लिए शुभ होगा । भारत में हाल में महिलाओं को विधायिका में 33% आरक्षण देने की बात संसद में पारित हो चुकी है ।

 

Civics Lokatantr me SattaKi Sajhedari Subjective Question Answer 2024

 

प्रश्न 9. किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्म-निरपेक्ष देश बनाता है ?

उत्तर ⇒ (i) भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सांविधान संशोधन द्वारा भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है।

(ii) संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख कर दिया गया है कि भारत का अपना कोई धर्म नहीं है।

प्रश्न 10. भाषा नीति क्या है ?

उत्तर ⇒भारत वास्तव में विविधतापूर्ण देश है जहाँ 114 से अधिक प्रमुख भाषाओं का प्रयोग होता है। इसमें इन सभी भाषाओं के प्रति आदर होना चाहिए। ये सब मिलकर हमारी भाषाई विरासत को समृद्ध बनाते हैं तथा उन्हें साथ विकसित होने में मदद करते हैं। अतः, प्रमुख भाषाओं को समाहित करने की नीति ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है। भारतीय संविधान में प्रमुख भाषाओं को समाहित किया गया है। जैसे–हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला, तेलगु, कन्नड़ आदि यही भाषा नीति है। इसे अपना कर राष्ट्रीय एकता को सबल बनाया गया है।

प्रश्न 11. भारत को गणतंत्र क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒भारत ने 26 जनवरी, 1950 ई० को स्वनिर्मित संविधान को अंगीकार एवं स्वीकार किया जिसमें नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को सुरक्षित रखने पर बल दिया गया। अतः, भारत को गणतंत्र कहा जाता है ।

प्रश्न 12. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 के विषय में लिखें ।
अथवा, देश के सभी, नागरिकों को स्वतंत्रता का मूल अधिकार संविधान के किस अनुच्छेद में दिया गया है ?

उत्तर ⇒ हमारे संविधान के अनुच्छेद-19 में देश के सभी नागरिकों को स्वतंत्रता का मूल अधिकार दिया गया है ।

प्रश्न 13. संघात्मक शासन व्यवस्था में लिखित संविधान क्यों आवश्यक है ?

उत्तर ⇒संघात्मक शासन व्यवस्था में लिखित संविधान आवश्यक है । क्योंकि इस शासन-व्यवस्था में प्रान्तों व केन्द्र सरकार के मध्य शक्तियों का बँटवारा किया जाता है। शक्तियों का बँटवारा संविधान द्वारा ही किया जाता है । यदि संविधान लिखित नहीं होगा तथा शक्तियों का बँटवारा स्पष्ट तथा सुनिश्चित नहीं होगा तो केन्द्र व प्रान्तों के मध्य अधिक विवाद उत्पन्न होंगे ।

प्रश्न 14. रंग भेद क्या है ?

उत्तर ⇒रंग-भेद का तात्पर्य चमड़ी ( Skin) के रंग के आधार पर लोगों में भेदभाव करना है । दक्षिण अफ्रीका में गोरे लोगों की सरकार ने बहुसंख्यक काले लोगों के प्रति विभिन्न प्रकार के भेदभावों की नीति अपनायी थी। इसे रंग-भेद नीति के नाम से जानते हैं ।

प्रश्न 15. सामाजिक विविधता राष्ट्र के लिये कब घातक बन जाती है ?

उत्तर ⇒ सामाजिक विविधता वैसे तो समाज के विकास का लक्षण है; लेकिन जब यह विविधता लोगों में तनाव, संघर्ष व अलगाववाद को जन्म देती है तो यह राष्ट्र के लिये घातक बन जाती है। भारत में जाति, धर्म, संस्कृति, भाषा आदि की विविधताएँ पायी जाती हैं। लेकिन निहित स्वार्थों तथा सहनशीलता के अभाव में ये विविधताएँ सामाजिक तनाव का कारण बन जाती हैं जो कि राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है ।

प्रश्न 16. नारी सशक्तीकरण से आपका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर ⇒ नारी सशक्तीकरण का तात्पर्य यह है कि महिलाओं को उनको प्रभावित करने वाले आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व पारिवारिक मामलों में नीति निर्माण प्रक्रिया में भागीदारी प्रदान की जाए। वर्तमान युग में नारी सशक्तीकरण की धारणा को राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन प्राप्त हो रहा है । भारत सरकार ने वर्ष 2000 में नारी सशक्तीकरण की नई नीति की घोषणा की है। पंचायतों व नगरपालिकाओं में महिला आरक्षण नारी सशक्तीकरण का उदाहरण है ।

प्रश्न 17. ” हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती ।” कैसे ?

उत्तर ⇒यह कोई आवश्यक नहीं है कि सभी सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का आधार होता है। संभवतः दो भिन्न समुदायों के विचार भिन्न हो सकते हैं, परन्तु हित समान होगा। उदाहरणार्थ मुंबई में मराठियों के हिंसा का शिकार व्यक्तियों की जातियाँ भिन्न थीं, धर्म भिन्न होंगे, लिंग भिन्न हो सकता है, परन्तु उनका क्षेत्र एक ही था। वे सभी एक ही क्षेत्र उत्तर भारतीय थे। उनका हित समान था और वे सभी अपने व्यवसाय और पेशा में संलग्न थे। इस कारण हम कह सकते हैं कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं हो सकती।

प्रश्न 18. दो कारण बताएँ कि क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते

उत्तर ⇒जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते, इसके दो कारण हैं
(i) जिस निर्वाचन क्षेत्र में जिस जाति के मतदाताओं की संख्या अधिक होती है, प्रायः सभी राजनीतिक दल उसी जाति के उम्मीदवार को टिकट देते हैं। अतः जाति विशेष के मतदाताओं के वोट विभिन्न दलों के उम्मीदवारों के बीच बँट जाते हैं।
(ii) उम्मीदवार को अपनी जाति के मतदाताओं के साथ-साथ अन्य जातियों
के मतदाताओं के मत की आवश्यकता जीतने के लिए होती है।

प्रश्न 19. सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं ?

उत्तर ⇒ सामाजिक विभाजन तब होता है जब कुछ सामाजिक अन्तर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं । सवर्णों और दलितों का अंतर एक सामाजिक विभाजन है, क्योंकि दलित संपूर्ण देश में आमतौर पर गरीब, वंचित एवं बेघर हैं और भेदभाव का शिकार हैं, जबकि सवर्ण आम तौर पर सम्पन्न एवं सुविधायुक्त हैं, अर्थात् दलितों को महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं। अतः, हम कह सकते हैं कि जब एक तरह का सामाजिक अंतर अन्य अंतरों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाता है और लोगों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं तो इससे सामाजिक विभाजन की स्थिति पैदा होती है ।

प्रश्न 20. सत्तर के दशक से आधुनिक दशक के बीच भारतीय लोकतंत्र का सफर (सामाजिक न्याय के संदर्भ में) का संक्षिप्त वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ सत्तर के दशक के पूर्व भारत की राजनीति अवचेतना सुविधा – परस्त हित
समूह के बीच झूलती रही। दूसरे शब्दों में कहें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 1967 तक राजनीति में सवर्ण जातियों का वर्चस्व रहा। सत्तर से नब्बे तक के दशक के बीच सवर्ण और मध्यम पिछड़े जातियों में सत्ता पर कब्जा के लिए संघर्ष चला । नब्बे के दशक के उपरांत पिछड़े जातियों का वर्चस्व तथा दलितों की जागृति की अवधारणाएँ राजनीतिक गलियारों में उपस्थिति दर्ज कराती रहीं और नीतियों को प्रभावित करती रहीं । भारतीय राजनीति के इस महामंथन में पिछड़े और दलितों का संघर्ष प्रभावी रहा । आधुनिक दशक के वर्षों में राजनीति का पलड़ा दलितों और महादलितों (बिहार के संदर्भ में) के पक्ष में झुकता दिखाई दे रहा है। सरकार के नीतियों के सभी परिदृश्यों में दलित न्याय की पहचान सबके केन्द्र बिन्दु का विषय बन गया है।

 

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प्रश्न 21. सामाजिक विभाजन कब होता है ?

उत्तर ⇒ सामाजिक विभाजन तब होता है जब सामाजिक अन्तर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं।

प्रश्न 22. माँगें आसान कब बन जाती हैं ?

उत्तर ⇒ माँगें आसान एवं स्वीकृति योग्य तब बन जाती हैं जब ये संविधान के दायरे की होती हैं तथा दूसरे समुदाय को नुकसान पहुँचाने वाली नहीं होती हैं ।

प्रश्न 23. बेल्जियम में सामाजिक विभाजन का आधार क्या है ?

उत्तर ⇒ बेल्जियम में सामाजिक विभाजन का आधार नस्ल और जाति न होकर भाषा विभाजन का आधार है

प्रश्न 24. नस्ल के आधार पर भेदभाव का उदाहरण कहाँ देखने को मिलता है ?

उत्तर ⇒नस्ल या रंग के आधार पर भेदभाव का सटीक उदाहरण मेक्सिको ओलम्पिक 1968 ने पदक समारोह में देखा गया ।

प्रश्न 25. गृहयुद्ध किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒जब एक ही देश में रहनेवाले विभिन्न गुटों में आपसी संघर्ष और मार-काट शुरू हो जाता है तो इसे गृहयुद्ध का नाम दिया जाता है। जैसे- श्रीलंका में तमिलों और सिंहली समुदाय का युद्ध ।

प्रश्न 26. क्या सामाजिक विभाजन राजनैतिक शक्ल अख्यितार करती है ?

उत्तर ⇒हाँ, दुनिया के तमाम देशों में सामाजिक विभाजनों के आधार अलग-अलग होते हैं, किन्तु अंततः ये सामाजिक विभाजन राजनैतिक शक्ल अख्तियार करने लग जाते हैं ।

प्रश्न 27. गरीबी रेखा के नीचे के निर्धारक लिखें ।

उत्तर ⇒ ग्रामीण क्षेत्रों के लिय प्रतिव्यक्ति प्रति माह 327 रुपये तथा शहरी क्षेत्रों के लिए प्रति व्यक्ति प्रति माह यदि व्यय 455 रुपये से कम है तो वह व्यक्ति या परिवार गरीबी रेखा के नीचे का है।

प्रश्न 28. बहुस्तरीय पहचान एवं राष्ट्रीय पहचान में अन्तर बताएँ ।

उत्तर ⇒ बहुस्तरीय पहचान किसी व्यक्ति का अथवा व्यक्तिगत होता है जबकि राष्ट्रीय पहचान राष्ट्रीय स्तर पर होता है। हम सब भारतीय हैं, नारा राष्ट्रीय पहचान का संकेतक है।

प्रश्न 29. सामाजिक विभाजन की स्थिति कब पैदा होती है ?

उत्तर ⇒ जब एक तरह का सामाजिक अंतर अन्य अंतरों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है और लोगों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय में हैं तो इससे सामाजिक विभाजन की स्थिति पैदा होती है ।

प्रश्न 30. श्रीलंका और भारत में सामाजिक विभाजन का आधार क्या है ?

उत्तर ⇒ श्रीलंका में समाजिक विभाजन भाषा और क्षेत्र दोनों आधार पर दिखाई देता है जबकि भारत में सामाजिक विविधता कई रूपों में है । भाषा, क्षेत्र, संस्कृति, धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भारत में सामाजिक विभाजन है ।

प्रश्न 31. सामाजिक राजनीति के परिणाम किन तीन बातों पर निर्भर करते हैं ?

उत्तर ⇒ स्वयं की पहचान की चेतना, समाज के विभिन्न समुदायों की माँगों को राजनीतिक दलों द्वारा उपस्थित करने का तरीका तथा सरकार की माँगों के प्रति सोच पर सामाजिक राजनीतिक के परिणाम निर्भर करते हैं।

प्रश्न 32. सामाजिक विभेद की उत्पत्ति का एक कारण बताएँ ।

उत्तर ⇒सामाजिक विभेद की उत्पत्ति का सबसे मुख्य कारण जन्म माना जाता है। जन्म के कारण ही कोई व्यक्ति किसी विशेष समुदाय का सदस्य बन जाता है। सवर्ण, दलित, मुस्लिम, ईसाई जैसे समुदायों की सदस्यता जन्म आधारित होती है। सामाजिक विभेद यहीं से पनपता है।

Class 10th Civics Subjective Question

 

प्रश्न 33. विविधता राष्ट्र के लिए कब घातक बन जाती है ?

उत्तर ⇒ एक सीमा में रहने पर विविधता राष्ट्र के लिए उपयोगी होती है। सीमा का उल्लंघन होते ही सामाजिक विभाजन और आपसी संघर्ष शुरू हो जाता है। ऐसी स्थिति में ही विविधता राष्ट्र के लिए घातक बन जाती है। श्वेत और अश्वेत का संघर्ष, हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच दंगा, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक के बीच संघर्ष इसके उदाहरण हैं ।

                            दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भावी समाज में लोकतंत्र की जिम्मेवारी और उद्देश्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ टकराव एवं सामंजस्य लोकतंत्र की सीढ़ियाँ हैं जिससे गुजरकर ही लोकसत्ता अपनी नीतियाँ निर्धारित करती हैं। ये नीतियाँ आसानी से निर्धारित नहीं हो पाते, बल्कि प्रतिद्वंद्विता के कठिन परिवेश से गुजरते हुए सामंजस्य का माहौल बनाने का प्रयास करता है। पुनः परिस्थिति के परिणामस्वरूप सभी संघर्ष गुटे अंततः इसे स्वीकार कर ही लेते हैं और नीतियाँ निर्धारित हो ही जाती हैं। पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मुहिम कई वर्ष पहले शुरू हुई | लोकतंत्र में सामाजिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति एक सामान्य बात है और यह एक स्वस्थ राजनीति का लक्षण भी है। राजनीति में विभिन्न तरह से सामाजिक विभाजनों की अभिव्यक्ति ऐसे विभाजनों के बीच संतुलन पैदा करने का भी काम करती है। परिणामतः कोई भी सामाजिक विभाजन एक हद से ज्यादा उग्र नहीं हो पाता और यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को मजबूत करने में सहायक भी होता है । लोकतंत्र में लोग संवैधानिक तरीके से अपनी माँगों को उठाते हैं और चुनावों के माध्यम से उनके लिए दबाव बनाते हैं, उनका समाधान पाने का प्रयास करते हैं ।

प्रश्न 2. भारत में जातिवाद पनपने के किन्हीं चार कारणों का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒ जातिवाद के निम्नांकित चार कुंप्रभाव हैं-
(1) समाज में रूढ़िवाद और सामाजिक कुरीतियों का विकास ।

(ii) विभिन्न जातियों के लोगों द्वारा एक-दूसरे को अश्रद्धा एवं घृणा की दृष्टि से देखने के कारण लोगों के बीच असमानता एवं फूट की भावना में वृद्धि ।

(iii) जातिवाद के कारण राष्ट्र का अनेक समूहों और टुकड़ों में बँट जाने के कारण राष्ट्रीय एकता पर कुठाराघात ।

(iv) लोगों के व्यक्तित्व का स्वतंत्र रूप से विकास नहीं होने के कारण राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में रुकावट ।

प्रश्न 3. साम्प्रदायिकता के किन्हीं चार कारणों को लिखें ।

उत्तर ⇒ साम्प्रदायिकता के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(i) एक धर्म के अनुयायियों के लौकिक हित दूसरे धर्म के अनुयायियों के लौकिक हित बिल्कुल भिन्न तथा परस्पर विरोधी होना ।

(ii) एक-दूसरे के धार्मिक व सांस्कृतिक क्रियाकलापों में अंतर तथा विरोध का होना।

(iii) अंग्रेजों की ‘फूट डालो व राज्य करो’ की नीति द्वारा खास धर्म को प्रोत्साहित करना ।

(iv) राजनीतिज्ञों द्वारा सत्ता प्राप्ति के लिए विशेष धर्म को बढ़ावा देना व सामाजिक विभेदकारी तत्त्वों को प्रश्रय देना ।

प्रश्न 4. भारत में किस तरह जातिगत असमानताएँ जारी हैं ? स्पष्ट करें ।

उत्तर ⇒ भारत में जाति-प्रथा का पूर्णरूपेण उन्मूलन नहीं हुआ है। अधिकांश शादी-ब्याह अपने ही जाति में होता है और इसे उत्तम माना गया है। स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद हमारे समाज में अभी भी छुआछूत विद्यमान है। सदियों से कुछ जातीय समूह लाभकर स्थिति में है; तो कुछ को दबाया जा रहा है । कुछ सशक्त जातियाँ पहले से ही शिक्षा में अग्रणी रहे हैं जिस कारण शिक्षा के क्षेत्र मैं अभी भी उनका ही बोलवाला है। कुछ जातीय समुदाय (दलित एवं आदिम जातियाँ) अभी भी शिक्षा से वंचित हैं । स्वभाविक है कि वे पिछड़े हैं। यही कारण है कि शहरी मध्यम वर्ग में सबल जातिय समुदाय का अनुपात ज्यादा है और उनमें जागृति भी ज्यादा है। चूँकि जाति और आर्थिक हैसियत में निकट का संबंध है, अतएव उनकी सामाजिक हैसियत भी अच्छी है । समाज में वर्चस्व है । दूसरे शब्दों में कहें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आर्थिक असमानता का एक महत्त्वपूर्ण आधार जाति भी है । पुराने जमाने में अछूत या शुद्र को जमीन रखने का अधिकार नहीं था । प्राचीन काल में दलित को शिक्षा पाने का अधिकार भी नहीं था । ‘द्विज’ जातियों को भी शिक्षा पाने का अधिकार था । यद्यपि आज जाति पर आधारित इस प्रकार की भावना का निषेध कर दिया गया है और इस प्रकार के कृत्य को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है। फिर भी, सदियों से जिस प्रवृत्ति ने वंचित कुछ जातीय समुदाय को लाभ या घाटा में रखा, उसका असर अब भी समाज में मौजूद है । इस असमानताओं को पूरी तरह से तो नहीं ही मिटाया जा सका, बल्कि
है कुछ अन्य तरह के असमानताओं की भी वृद्धि हुई है ।

 

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प्रश्न 5. सामाजिक विभाजनों की राजनीति का परिणाम किन-किन चीजों पर निर्भर करता है ?

उत्तर ⇒ सामाजिक विभाजनों की राजनीति का परिणाम तीन चीजों पर निर्भर करता है-
पहला, लोग अपनी पहचान स्व-अस्तित्व तक ही सीमित रखना चाहते हैं, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य में राष्ट्रीय चेतना के अलावा उपराष्ट्रीय या स्थानीय चेतना भी होते हैं । दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि अगर लोग अपने बहुस्तरीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा मानते हैं तो कोई समस्या नहीं हो सकती । उदाहरणस्वरूप, बेल्जियम के अधिकतर लोग खुद को बेल्जियाई ही मानते हैं, भले ही वे डच और जर्मन बोलते हैं। हमारे देश में भी ज्यादातर लोग अपनी पहचान को लेकर ऐसा ही नजरिया रखते हैं। भारत विभिन्नताओं का देश है, फिर भी सभी नागरिक सर्वप्रथम अपने को भारतीय मानते हैं । दूसरा, महत्त्वपूर्ण तत्त्व है कि किसी समुदाय या क्षेत्र विशेष की माँगों को राजनीतिक दल कैसे उठा रहे हैं । संविधान के दायरे में आनेवाली और दूसरे समुदाय को नुकसान न पहुँचानेवाली माँगों को मान लेना आसान है । तीसरा, सामाजिक विभाजन की राजनीति का परिणाम सरकार के रूप पर भी निर्भर करता है । यह भी महत्त्वपूर्ण है कि सरकार इन माँगों पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। अगर भारत में पिछड़ों एवं दलितों के प्रति न्याय की माँग को सरकार शुरू से ही खारिज करती रहती तो आज भारत बिखराव के कगार पर होता, लेकिन सरकार इनके सामाजिक न्याय को उचित मानते हुए सत्ता में साझेदार बनाया और इनको देश की मुख्य धारा में जोड़ने का ईमानदारी से प्रयास किया । फलतः छोटे-मोटे संघर्ष के बावजूद भी भारतीय समाज में समरसता और सामंजस्य स्थापित है ।