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Matric Biology Jaib Prakram Ka Prabandhan Subjective Questions 2024 [ जीवविज्ञान ] जैव प्रक्रम सब्जेक्टिव क्वेश्चन
Class 10th Biology Subjective Question Answer 2024 Class 10th Subjective Question

Matric Biology Jaib Prakram Ka Prabandhan Subjective Questions 2024 [ जीवविज्ञान ] जैव प्रक्रम सब्जेक्टिव क्वेश्चन

जीवविज्ञान (Biology) जैव प्रक्रम 2024:- हैलो दोस्तो अगर आप मैट्रिक परीक्षा 2024 के लिए तैयारी कर रहे है तो यहां पर क्लास 10th Biology जीवविज्ञान का महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर ( Class 10th Biology vvi Subjective Question Answer ) दिया गया है यहां पर क्लास 10th जीवविज्ञान 2024 का मॉडल पेपर ( Class 10th Biology Model Paper ) तथा ऑनलाइन टेस्ट ( Online Test ) भी दिया गया है और PDF डाउनलोड कर के भी पढ़ सकते हैं । और आप मैट्रिक के फाइनल एग्जाम में अच्छा मार्क्स ला सकते हैं और अपने भाविष्य को उज्वल बना सकते है धन्यवाद –

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Matric Biology Jaib Prakram Ka Prabandhan Subjective Questions 2024 [ जीवविज्ञान ] जैव प्रक्रम सब्जेक्टिव क्वेश्चन

 

प्रश्न 1. अमीबा में पोषण की प्रक्रिया को चित्र के साथ समझाएँ ।

उत्तर ⇒ अमीबा सूक्ष्म जीवों को अपना भोजन बनाता है तथा सूक्ष्म पौधों को भी अपना भोजन बनाता है जो जल में तैरते रहते हैं। इसका भोजन ग्रहण करने का तरीका होलोजोइक है । यह पादाभ बनाकर अपना शिकार पकड़ता है ।

प्रश्न 2. मनुष्य के आहारनाल का एक स्वच्छ – नामांकित चित्र बनाएँ ।

उत्तर ⇒ मनुष्यों में पाचन क्रिया – मनुष्य की पाचन क्रिया निम्नलिखित चरणों में विभिन्न अंगों में पूर्ण होती है –

(i) मुखगुहा में पाचन – मनुष्य मुख के द्वारा भोजन ग्रहण करता है। मुख में स्थित दाँत भोजन के कणों को चबाते हैं जिससे भोज्य पदार्थ छोटे-छोटे कणों में विभक्त हो जाता है। लार ग्रंथियों से निकली लार भोजन में अच्छी तरह से मिल जाती है। लार में उपस्थित एंजाइम भोज्य पदार्थ में उपस्थित मंड (स्टार्च) को शर्करा (ग्लूकोज) में बदल देता है। लार भोजन को लसदार चिकना और लुग्दीदार बना देती है, जिससे भोजन ग्रसिका में से होकर आसानी से आमाशय में पहुँच जाता है ।

(ii) आमाशय में पाचन क्रिया – जब भोजन आमाशय में पहुँचता है तो वहाँ भोजन का मंथन होता है जिससे भोजन और छोटे-छोटे कणों में टूट जाता है । भोजन में नमक का अम्ल मिलता है जो माध्यम को अम्लीय बनाता है तथा भोजन को सड़ने से रोकता है। आमाशयी पाचक रस में उपस्थित एंजाइम प्रोटीन को छोटे-छोटे अणुओं में तोड़ देते हैं ।

(iii) ग्रहणी में पाचन – आमाशय में पाचन के बाद जब भोजन ग्रहणी में पहुँचता है तो यकृत में आया पित्तरस भोजन से अभिक्रिया करके वसा का पायसीकरण कर देता है तथा माध्यम को क्षारीय बनाता है जिससे अग्नाशय से आये पाचक रस में उपस्थित एंजाइम क्रियाशील हो जात हैं और भोजन में उपस्थितं प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं वसा का पाचन कर देते हैं ।

(iv) क्षुद्रांत्र में पाचन – ग्रहणी में पाचन के बाद जब भोजन क्षुद्रांत्र में पहुँचता है तो वहाँ आंत्र रस में उपस्थित एंजाइम बचे हुए अपचित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा का पाचन कर देते हैं । आस्त्र की विलाई द्वारा पचे हुए भोजन का अवशोषण कर लिया जाता है तथा अवशोषित भोजन रक्त में पहुँचा दिया जाता है ।

(v) बड़ी आंत्र (मलाशय) में पाचन – क्षुद्रांत्र में भोजन के पाचन एवं अवशोषण के बाद जब भोजन बड़ी आंत्र में पहुँचता है तो वहाँ पर अतिरिक्त जल का अवशोषण कर लिया जाता है, बड़ी आंत्र में भोजन का पाचन नहीं होता । भोजन का अपशिष्ट ( अतिरिक्त ) भाग यहाँ पर एकत्रित होता रहता है तथा समय-समय पर मल द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है ।

प्रश्न 3. मानव श्वसन तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ मानव के श्वसन तंत्र का कार्य शुद्ध वायु को शरीर के भीतर भोजन तथा                   अशुद्ध वायु को बाहर निकलना है ।

इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं –

(i) नासांद्वार एवं नासागुहा – नासाद्वार से वायु शरीर के भीतर प्रवेश करती है। नाक में छोटे-छोटे और बारीक बाल होते हैं जिनसे वायु छन जाती है । उसकी धूल उनसे स्पर्श कर वहीं रुक जाती है इस मार्ग में श्लेष्मा की परत इस कार्य में सहायता करती है। वायु नम हो जाती है ।

(ii) ग्रसनी – ग्रसनी ग्लॉटिस नामक छिद्र से श्वासनली में खुलती है। जब हम भोजन करते हैं तो ग्लॉटिस त्वचा के एक उपास्थियुक्त कपाट एपिग्लाटिस से ढँका रहता है ।

(iii) श्वास नली – उपास्थित से बनी हुई श्वासनली गर्दन से नीचे आकर श्वसनी बनाती है। यह वलयों से बनी होती है तो सुनिश्चित करते हैं कि वायु मार्ग में रुकावट उत्पन्न न हो ।

(iv) फुफ्फुस – फुफ्फुस के अंदर मार्ग छोटी और छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाते हैं जो गुब्बारे जैसी रचना में बदल जाता है। इसे कूपिका कहते हैं । कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है। कूपिकाओं की भित्ति में रुधिर वाहिकाओं का विस्तीर्ण जाल होता है ।

(v) कार्य – जब हम श्वास अंदर लेते हैं, हमारी पसलियाँ ऊर उठती हैं और हमारा डायाफ्राम चपटा हो जाता है। इससे वक्षगुहिका बड़ी हो जाती है और वायु फुफ्फुस के भीतर चूस ली जाती है। वह विस्तृत कूपिकाओं को ढक लेती है । रुधिर शेष शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है। कूपिका रुधिर वाहिका का रुधिर कूपिका वायु से ऑक्सीजन लेकर शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है। श्वास चक्र के समय जब वायु अंदर और बाहर होती है, फुफ्फुस सदैव वायु का विशेष आयतन रखते हैं जिससे ऑक्सीजन के अवशोषण तथा कार्बन डाइऑक्साइड के मोचन के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है

प्रश्न 4. मनुष्य के उत्सर्जी तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ वृक्क एवं इसके अनेक सहायक अंग मनुष्य के उत्सर्जी तंत्र कहते हैं । वृक्क उत्सर्जन तंत्र का प्रमुख
अंग है जो केवल उत्सर्जी पदार्थों को उपयोगी पदार्थों से छानकर अलग कर देता है । वृक्क भूरे रंग का, सेम के बीज के आकार की संरचनाएँ हैं, जो कि उदरगुहा में कशेरूक दंड के दोनों तरफ होती है। प्रत्येक वृक्क लगभग 10 cm लंबा, 6 cm चौड़ा और 2.5 cm मोटा होता है । यकृत की वजह से दायाँ वृक्क का बाहरी किनारा उभरा हुआ होता है जबकि भीतरी किनारा धँसा होता है जिसे हाइलम कहते हैं और इसमें से मूत्र नलिका निकलती है। मूल नलिका जाकर एक पेशीय थैले जैसी संरचना में खुलती है जिसे मूत्राशय कहते हैं ।

 

Biology Jaib Prakram Ka Prabandhan Subjective Question Answer 2024

 

प्रश्न 5. एक प्रयोग द्वारा दर्शाएँ कि प्रकाश-संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल आवश्यक है।.

उत्तर ⇒ प्रकाश-संश्लेषण के लिए पर्णहरित आवश्यक होता है, इसकी पुष्टि के लिए निम्नलिखित प्रयोग किया जाता है-

एक क्रोटन पौधे के गमले को 24 – 48 घंटे के लिए अंधकार में रख दिया जाता है। फिर एक निश्चित अवधि के पश्चात् इसकी एक पत्ती को तोड़कर उसका स्टॉर्च परीक्षण आयोडीन से किया जाता है। निरीक्षण करने पर यह देखा जाता है कि पत्ती का वह स्थान जो हरा था, नीला हो गया और पीले भाग पर आयोडीन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। प्रयोग द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि हरे भाग में पर्णहरित उपस्थित होता है जिससे वहाँ प्रकाश-संश्लेषण द्वारा स्टॉर्च का निर्माण हुआ, अन्य स्थानों पर नहीं। अतः, इससे स्पष्ट होता है कि प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया के लिए क्लोरोफिल आवश्यक है ।

प्रश्न 6, वृक्काणु (नेफरॉन) की संरचना तथा क्रियाविधि का वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ वृक्काणु की संरचना –  वृक्काणु गुर्दे की संरचनात्मक इकाई है। इसमें एक नलिका होता है जो एक ओर संग्राहक वाहिनी से जुड़ा रहता है तथा एक कप की आकृति की संरचना से दूसरी ओर । इस कप की आकृति की संरचना को बोमेन संपुट कहते हैं । प्रत्येक बोमेन संपुट में केशिकाओं के गुच्छे कप के अन्दर होते हैं जिसे कोशिका गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कहते हैं। कोशिका गुच्छ में रुधिर एफरेंट धमनी द्वारा प्रवेश करता है तथा इफरेंट धमनी द्वारा बाहर निकलता है ।

नेफरॉन के कार्य निम्नलिखित है ।

(i) छानना – रुधिर, बोमेन संपुट के अन्दर कोशिका गुच्छ की केशिकाओं द्वारा छाना जाता है । निस्यंद वृक्काणु के नलिकाकार हिस्सों से गुजरता है। इस निस्यंद में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, यूरिया, यूरिक अम्ल, लवण तथा जल की अत्यधिक मात्रा होती है ।

(ii) पुनः अवशोषण – जैसे-जैसे निस्यंद नलिका में बहता जाता है वैसे-वैसे लाभप्रद पदार्थ, जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण तथा जल, विशेष रूप से वृक्काणु को घेरती हुई केशिकाओं द्वारा अवशोषित कर दिया जाता है। पानी की कितनी मात्रा का पुनः अवशोषण हो, यह इस बात पर निर्भर करता है कि शरीर को कितने पानी की आवश्यकता है तथा उस उत्सर्जक पदार्थ की मात्रा क्या है जिसका उत्सर्जन होना है ।

(iii) मूत्र – पुनः अवशोषण के पश्चात् जो निस्यंद बचता है, उसे मूत्र कहते हैं। मूत्र में घुले हुए नाइट्रोजनयुक्त उत्सर्जक, जैसे- यूरिया, यूरिक अम्ल, अतिरिक्त लवण तथा पानी होता है । मूत्र कलेक्टिंग डक्टों द्वारा वृक्काणु से एकत्रित होती है और फिर यूरेटर में ले जाई जाती है ।

प्रश्न 7. मनुष्य के हृदय की संरचना और क्रिया-विधि समझाइए ।

 

उत्तर ⇒ संरचना – मनुष्य का हृदय चार भागों में कोष्ठों में बँटा रहता है-अग्र दो भाग आलिंद कहलाते हैं । इनसे एक बायाँ आलिंद तथा दूसरा दायाँ आलिंद होता है। पश्व दो भाग निलय कहलाता है जिनमें एक बायाँ निलय तथा दूसरा दायाँ निलय होता है। बाँयें आलिंद एवं बाँयें निलय के बीच त्रिवलनी कपाट तथा दाएँ आलिंद एवं दाएँ निलय के बीच त्रिवलीन कपाट होते हैं। ये वाल्व निलय की ओर खुलते हैं ।
हैं बाएँ निलय का संबंध अर्द्धचंद्राकार द्वारा महाधमनी से तथा दाएँ निलय का संबंध अर्द्धचंद्राकार कपाट द्वारा फुफ्फुस धमनी से होता है। दाएँ आलिंद से महाशिरा आकर मिलती है तथा बाएँ आलिंद से फुफ्फुस शिरा आकर मिलती है ।

हृदय की क्रियाविधि – हृदय के आलिंद व निलय में संकुचन व शिथिलन दोनों क्रियाएँ होती हैं। यह क्रियाएँ एक निश्चित क्रम में निरंतर होती हैं । हृदय की एक धड़कन या स्पंदन के साथ एक कर्डियक चक्र पूर्ण होता है ।

एक चक्र में निम्नलिखित चार अवस्थाएँ होती हैं –

(i) शिथिलन- इस अवस्था में दोनों आलिंद शिथिलन अवस्था में रहते हैं और रुधिर दोनों आलिंदों में एकत्रित होता है ।

(ii) आलिंद संकुचन- आलिंदों के संकुचित होने को आलिंद संकुचन कहते हैं। इस अवस्था में आलिंद निलय कपाट खुल जाते हैं और आलिंदों से रुधिर निलयों में जाता है । दायाँ आलिंद सदैव बाँयें आलिंद से कुछ पहले संकुचित होता है ।

(iii) निलय संकुचन – निलयों के संकुचन को निलय संकुचन कहते हैं, जिसके फलस्वरूप आलिंद – निलय कपाट बंद हो जाते हैं एवं महाधमनियों के अर्द्धचंद्राकार कपाट खुल जाते हैं और रुधिर महाधमनियों में चला जाता है ।

(iv) निलय शिथिलन – संकुचन के पश्चात् निलयों में शिथिलन होता है और अर्द्धचंद्राकार कपाट बंद हो जाते हैं । निलयों के भीतर रुधिर दाब कम हो जाता है जिससे आलिंद निलय कपाट खुल जाते हैं ।

प्रश्न 8. रक्त क्या है ? इसके संघटन का वर्णन कार्य के साथ करें ।

उत्तर ⇒ रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है जो उच्च बहुकोशिकीय जन्तुओं में एक तरल परिवहन माध्यम है, जिसके द्वारा शरीर के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थानों में पदार्थों का परिवहन होता है ।

मानव रक्त के निम्नलिखित दो प्रमुख घटक होते हैं –

(a) द्रव घटक, जिसे प्लाज्मा कहते हैं

(b) रक्त कोशिकाएँ ।

(a) प्लाज्मा :- यह हल्के पीले रंग का चिपचिपा द्रव है, जो आयतन के हिसाब से पूरे रक्त का 55% होता है। इसमें करीब 90% जल, 7% प्रोटीन, 0.09% अकार्बनिक लवण, 0.18% ग्लूकोज, 0.5% वसा तथा शेष अन्य कार्बनिक पदार्थ विद्यमान होते हैं। इनमें उपस्थित प्रोटीन को प्लाज्मा प्रोटीन कहते हैं, जिनमें प्रमुख हैं – फाइब्रिनोजन, प्रोओबिन तथा हिपैरिन । फाइब्रिनोजनरहित प्लाज्मा को सीरम कहते हैं ।

(b) रक्त कोशिकाएँ :- आयतन के हिसाब से रक्त कोशिकाएँ कुल रक्त का 45% भाग हैं ।

ये निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं –

(i) लाल रक्त कोशिका

(ii) श्वेत रक्त कोशिका

(iii) रक्त पट्टिकाणु

(i) लाल रक्त कोशिका (Red Blood Cell/RBC) :- इन्हें एरीथ्रोसाइट्स (erythrocytes) भी कहते हैं, जो उभयनतोदर डिस्क की तरह रचना होती हैं। इनमें केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया एवं अंतर्द्रव्यजालिका जैसे कोशिकांगों का अभाव होता है । इनमें एक प्रोटीन वर्णक हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जिसके कारण रक्त का रंग लाल होता है। इसके एक अणु की क्षमता ऑक्सीजन के चार अणुओं से संयोजन की होती है। इसके इस विलक्षण गुण के कारण इसे ऑक्सीजन का वाहक कहते हैं। मनुष्य में इनकी जीवन अवधि 120 दिनों की होती है, और इनका निर्माण अस्थि-मज्जा में होता है। मानव के प्रति मिलीलीटर रक्त में इनकी संख्या 5-5.5 मिलियन तक होती है ।

(ii) श्वेत रक्त कोशिका (White Blood Cell/WBC) :- ये अनियमित आकार की न्यूक्लियसंयुक्त कोशिकाएँ हैं। इनमें हीमोग्लोबिन जैसे वर्णक नहीं पाये जाते हैं, जिसके कारण ये रंगहीन होती हैं। इन्हें ल्यूकोसाइट्स भी कहते हैं। मानव के प्रति मिलीलीटर में इनकी संख्या 5000-6000 होती है। संक्रमण की स्थिति में इनकी संख्या में वृद्धि हो जाती है ।

ये निम्नांकित दो प्रकार की होती है –

(a) ग्रैनुलोसाइट्स

(b) एग्रैनुलोसाइट्स ।

(a) ग्रेनुलोसाइट्स अपने अभिरंजन गुण के कारण तीन प्रकार की होती हैं –

(i) इयोसिनोफिल

(ii) बसोफिल

(iii) न्यूट्रोफिल ।

इनकी कोशिकाद्रव्य कणिकामय होती है । इयोसिनोफिल एवं न्यूट्रोफिल्स फैगोसाइटोसिस द्वारा हानिकारक जीवाणुओं का भक्षण करते हैं ।

(b) एग्रैनुलोसाइट्स निम्नांकित दो प्रकार के होते हैं –

(i) मोनोसाइट्स

(ii) लिम्फोसाइट्स |

इनमें उपस्थित केन्द्रक में अनेक घुडियाँ पाई जाती हैं । इनमें मोनोसाइट्स का कार्य भक्षण करना एवं लिम्फोसाइट्स का काम एंटिबॉडी का निर्माण करना होता है ।

(iii) रक्त पट्टिकाणु (Blood Platlets) :- ये बिम्बाणु या ओम्बोसाइट्स भी कहलाते हैं। ये रक्त का थक्का बनने (blood clotting) में सहायक होते हैं । रक्त के कार्य रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है, क्योंकि वह अपने प्रवाह के दौरान शरीर के सभी ऊतकों का संयोजन करता है ।

वैसे रक्त के तीन प्रमुख कार्य हैं –

(a) पदार्थों का परिवहन करता है ।

(b) संक्रमण से शरीर की सुरक्षा करता है ।

(c) शरीर के तापमान का नियंत्रण करना ।

रक्त के निम्नलिखित अन्य कार्य हैं –

(a) यह फेफड़े से ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न भागों में परिवहन करता है ।

(b) यह शरीर की कोशिकाओं से CO2 को फेफड़े तक लाता है, जो श्वासोच्छ्वास के द्वारा बाहर निकल जाता है ।

(c) यह पचे भोजन को छोटी आँत से शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाता है ।

(d) अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स को उपयुक्त अंग तक पहुँचाता है ।

(e) यह यकृत से यूरिया को गुर्दा तक पहुँचाता है ।

(f) यह शरीर को विभिन्न रोगाणुओं के संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करता है, रक्त के घटक WBC शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र का निर्माण करते हैं ।

(g) रक्त स्तनधारियों एवं पक्षियों के शरीर के तापमान को स्थिर बनाये रखता है ।

(h) रक्त पट्टिकाणु रक्त जमने में सहायक होते हैं ।

प्रश्न 9. ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या हैं ?

उत्तर ⇒ श्वसन एक जटिल पर अति आवश्यक प्रक्रिया है। इसमें ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है तथा ऊर्जा मुक्त करने के लिए खाद्य का ऑक्सीकरण होता है । श्वसन एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है ।

C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O

श्वसन क्रिया दो प्रकार की होती है –

(i) वायवीय श्वसन (ऑक्सी श्वसन ) – इस प्रकार के श्वसन में अधिकांश प्राणी ऑक्सीजन का उपयोग करके श्वसन करते हैं। इस प्रक्रिया में ग्लूकोज पूरी तरह से कार्बन डाइऑक्साइड और जल में विखंडित हो जाता है ।

चूँकि यह प्रक्रिया वायु की उपस्थिति में होती है, इसलिए इसे वायवीय श्वस कहते हैं

(ii) अवायवीय श्वसन ( अनॉव वसन ) – यह श्वसन प्रक्रिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होती है। जीवाणु और यीस्ट इस क्रिया से श्वसन करते हैं। इस प्रक्रिया में इथाइल ऐल्कोहॉल CO2 तथा ऊर्जा उत्पन्न होती है ।

(iii) ऑक्सीजन की कमी हो जाने पर – कभी-कभी हमारी पेशी कोशिकाओं में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। पायरूवेट के विखंडन के लिए दूसरा रास्ता अपनाया जाता है । तब पायरूवेट एक अन्य तीन कार्बन वाले अणु लैक्टिक अम्ल में बदल जाता है। इसके कारण क्रैम्प हो जाता है।

 

Biology vvi Subjective Question answer Notes Hindi

 

प्रश्न 10. प्रयोग द्वारा सिद्ध कीजिए कि प्रकाश-संश्लेषण के लिए CO2 आवश्यक है ।

उत्तर ⇒ उपकरण गमले में लगा पौधा, KOH के घोल से भरी बोतल, कोक, KI घोल आदि ।
विधि – गमले के पौधे को 36 से 48 घंटे अंधेरे में रखते हैं। एक हरी पत्ती को चौड़े मुँह की बोतल में कॉर्क के बीच इस प्रकार लगाते हैं कि पत्ती का आधा भाग KOH युक्त बोतल के अंदर रहे। बोतल के मुँह पर ग्रीस लगाकर वायुरुद्ध कर देते हैं । उपकरण को कुछ समय के लिए धूप में रखते हैं। कुछ घंटे बाद पत्ती को तोड़कर, पानी में उबालकर ऐल्कोहॉल से धोकर उस पर KI का घोल डालते हैं ।

निरीक्षण – पत्ती का अग्र भाग जो बोतल में था पीला हो जाता है, क्योंकि बोतल में रखे KOH के द्वारा बोतल की CO2 गैस सोख ली जाती है जिससे प्रकाश-संश्लेषण क्रिया पूरी न होने से पत्ती के अग्र भाग में मंड का निर्माण नहीं हो पाता है । शेष भाग मंड के कारण नीला हो जाता है ।

परिणाम – प्रयोग से सिद्ध होता है कि प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के लिए CO2 गैस आवयश्यक है ।

प्रश्न 11. ऑक्सी एवं अनॉक्सी श्वसन में अन्तर लिखें एवं अनॉक्सी श्वसन की क्रियाविधि लिखें ।

उत्तर-

 S.n      वायवीय श्वसन         अबायवीय श्वसन
 1.  खाद्य-पदार्थों के विश्लेषण के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के श्वसन में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती।
 2. कोशिका के कोशिका द्रव्य में होनेवाली क्रिया ग्लाइकोलिसिस कहलाती है जबकि माइटोकॉण्ड्रिया में होने वाली श्वसनीय क्रिया क्रैब चक्र कहलाती है।  यह क्रिया केवल कोशिका द्रव्य में ही होती है।
 3. इस क्रिया में 38 ATP अणु निर्मित होते हैं। इस क्रिया में ATP के केवल दो अणु ही बनते हैं।
 4. इस क्रिया में अन्तिम उत्पाद CO₂ तथा जल होता है। इस क्रिया के अन्तिम उत्पाद इथाइल ऐल्कोहॉल तथा कार्बन डाइऑक्साइड हैं।
 5. यह क्रिया सभी जीवधारियों में पायी जाती है। यह क्रिया कुछ ही जीवधारियों में पायी जाती है।
 6. इस क्रिया में खाद्य पदार्थ का पूर्णरूप से अपचयन होता है। इस क्रिया में भोजन का अपूर्ण रूप से अपचयन होता है।

प्रश्न 12. जीवधारियों में पोषण की आवश्यकता क्यों होती है ? कोई पाँच कारण लिखिए ।

उत्तर ⇒ वह विधि जिसके द्वारा पोषक तत्वों को ग्रहण कर उसका उपयोग करते हैं पोषण कहलाता है ।
जीवधारियों में पोषण की आवश्यकता निम्नलिखित कारण से जरूरी है –

(i) ऊर्जा – पोषण से जीवों को ऊर्जा की वाद्य आपूर्ति होना आवश्यक है, नहीं तो जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा ।

(ii) जैविक क्रियाओं – जैविक क्रियाओं के संपादन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा की प्राप्ति पोषण के द्वारा होता है ।

(iii) कोशिकाओं के निर्माण एवं मरम्मत – नई कोशिकाओं और ऊतकों के निर्माण एवं ऊतकों की टूट-फूट की मरम्मत हेतु नये जैव पदार्थों का संश्लेषण भी भोजन के द्वारा ही प्राप्त होता है ।

(iv) स्व-पोषण – स्व-पोषण में जीव सरल अकार्बनिक तत्वों से प्रकाश संश्लेषण प्रक्रम द्वारा अपने भोजन का संश्लेषण स्वयं करते हैं ।

(v) पर – पोषण – पर – पोषण में जीव अपना भोजन अन्य जीवों से जटिल और ठोस पदार्थ के रूप में प्राप्त करते हैं ।

प्रश्न 13. पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ पादप शरीर के निर्माण के लिए आवश्यक जल और खनिज लवणों को अपने निकट विद्यमान मिट्टी से प्राप्त करते हैं

(i) जल – हर प्राणी के लिए जल जीवन का आधार है। पौधों में जल जाइलम ऊतकों के द्वारा अन्य भागों में जाता है। जड़ों में धागे जैसी बारीक रचनाओं की बहुत बड़ी संख्या होती है । इन्हें मूलरोम कहते हैं । ये मिट्टी में उपस्थित पानी से सीधे संबंधित होते हैं । मूलरोम में जीव द्रव्य की सांद्रता मिट्टी में जल के घोल की अपेक्षा अधिक होती है । परासरण के कारण पानी मूलरोमों में चला जाता है पर इससे मूलरोम के जीव द्रव्य की सांद्रता में कमी आ जाती है और वह अगली कोशिका में चला जाता है । यह क्रम निरंतर चलता रहता है जिस कारण पानी जाइलम वाहिकाओं में पहुँच जाता है । कुछ पौधों में पानी 10-100 cm प्रति मिनट की गति से ऊपर चढ़ जाता है ।

(ii) खनिज – पेड़-पौधों को खनिजों की प्राप्ति अजैविक रूप में करनी होती है। नाइट्रेट, फॉस्फेट आदि पानी में घुल जाते हैं और जड़ों के माध्यम से पौधों में प्रविष्ट हो जाते हैं। वे पानी के माध्यम से सीधा जड़ों से संपर्क में रहते हैं । पानी और खनिज मिलकर जाइलम ऊतक में पहुँच जाते हैं और वहाँ से शेष भागों में चले जाते हैं । जल तथा अन्य खनिज लवण जाइलम के दो प्रकार के अवयवों वाहिनिकाओं एवं वाहिकाओं से जड़ों से पत्तियों तक पहुँचाये जाते हैं । ये दोनों मृत तथा स्थूल कोशिका भित्ति से युक्त होती हैं। वाहिनिकाएँ लम्बी, पतली, तुर्क सम कोशिकाएँ हैं जिनमें गर्त होते हैं। जल इन्हीं में से होकर एक वाहिनिका से दूसरी वाहिनिका में जाता है । पादपों के लिए वांछित खनिज, नाइट्रेट तथा फॉस्फेट अकार्बनिक लवणों के रूप में मूलरोम द्वारा घुलित अवस्था में अवशोषित कर जड़ में पहुँचाये जाते हैं । यही जड़ें जाइलम ऊतकों से उन्हें पत्तियों तक पहुँचाते हैं ।

प्रश्न 14. मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ जब हम श्वास अंदर लेते हैं तब हमारी पसलियाँ ऊपर उठती हैं और डायाफ्राम चपटा हो जाता है। इस कारण वक्षगुहिका बढ़ी हो जाती है और वायु फुफ्फुस के भीतर चली जाती है। वह विस्तृत कूपिकाओं को भर लेती है । रुधिर सारे शरीर से CO2 को कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है। कूपिका रुधिर वाहिका का रुधिर कूपिका वायु से ऑक्सीजन लेकर शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है। श्वास चक्र के समय जब वायु अंदर और बाहर होती है तब फुफ्फुस वायु का अवशिष्ट आयतन रखते हैं। इससे ऑक्सीजन के अवशोषण और कार्बन डाइऑक्साइड के मोचन के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है ।

प्रश्न 15. मनुष्य में दोहरे रक्त संचरण की व्याख्या कीजिए तथा इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए ।
अथवा, मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है ?

उत्तर ⇒ हृदय दो भागों में बँटा होता है। इसका दायाँ और बायाँ भाग ऑक्सी जनित और विऑक्सीजनित रुधिर को आपस में मिलने से रोकने में उपयोगी सिद्ध होता है । इस तरह का बँटवारा शरीर को उच्च दक्षतापूर्ण ऑक्सीजन की पूर्ति कराता है। जब एक ही चक्र में रुधिर दोबारा हृदय में जाता है तो उसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं ।

इसे इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है –

ऑक्सीजन को प्राप्त कर रुधिर फुफ्फुस में आता है । इस रुधिर को प्राप्त करते समय बायाँ अलिंद हृदय में बाँयीं ओर स्थित कोष्ठ बायाँ अलिंद शिथिल रहता है । जब बायाँ निलय फैलता है, तब यह संकुचित होता है, जिससे रुधिर इसमें चला जाता है । अपनी बारी पर जब पेशीय बायाँ निलय संकुचित होता है, तब रुधिर शरीर में पंपित हो जाता है । जब दायाँ अलिंद फैलता है तो शरीर से विऑक्सीजनित रुधिर इसमें आ जाता है। जैसे ही दायाँ अलिंद संकुचित होता है, नीचे वाला दायाँ निलय फैल जाता है। यह रुधिर को दाएँ निलय में भेज देता है जो रुधिर को ऑक्सीजनीकरण के लिए फुफ्फुस में पम्प कर देता है। अलिंद की अपेक्षा निलय की पेशीय भित्ति मोटी होती है, क्योंकि निलय को पूरे शरीर में रुधिर भेजना होता है । जब अलिंद या निलय संकुचित होते हैं तो वाल्ब उल्टी दिशा में रुधिर प्रवाह को रोकना सुनिश्चित करते हैं । दोहरे परिसंचरण का संबंध रक्त परिवहन से है । परिवहन के समय रक्त दो बार हृदय से गुजरता है। अशुद्ध रक्त दाएँ निलय से फेफड़ों में जाता है और शुद्ध होकर बाएँ आलिंद के पास आता है।

इसे पल्मोनरी परिसंचरण कहते हैं।

शुद्ध होने के बाद रक्त दाएँ आलिंद से पूरे शरीर में चला जाता है और फिर अशुद्ध होकर बाएँ निलय में प्रवेश कर जाता है। इसे सिस्टेमिक परिसंचरण कहते हैं।

द्विगुण परिसंचरण को निम्नलिखित चित्रों से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-

 

दोहरे परिसंचरण के कारण शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्राप्त हो जाती है। उच्च ऊर्जा की प्राप्ति होती है जिससे शरीर का उचित तापमान बना रहता है ।

 

Class 10th Biology Jaib Prakram Subjective Question 2024

 

प्रश्न 16. मानव में वहन तंत्र के घटक कौन-से है ? इन घटकों के क्या कार्य हैं ?

उत्तर ⇒ मानव में वहन तंत्र के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं –

हृदय वाहिनियाँ ( धमनियाँ, शिरायें), रुधिर ( ऑक्सीकृत तथा अनॉक्सीकृत) |

कार्य – हृदय रूधिर को शरीर के विभिन्न अंगों की सभी कोशिकाओं में वितरित करता है ।

धमनियाँ – रुधिर को हृदय से शरीर के विभिन्न भागों तक ले जानेवाली वाहिनियाँ हैं ।

शिराएँ – शरीर के विभिन्न भागों से रुधिर को एकत्र करके हृदय तक लाने वाली वाहिनियाँ शिराएँ कहलाती हैं ।

रुधिर – यह एक गहरे लाल रंग का संयोजी ऊतक है जिसमें तीन प्रकार की कोशिकाएँ स्वतंत्रतापूर्वक तैरती रहती हैं । भोजन, जल, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य वर्ज्य-पदार्थों के अतिरिक्त हॉर्मोंस भी इसी के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों में रहते हैं ।
लाल रुधिर कणिकाओं में उपस्थिति लाल रंग के पाउडर (हीमोग्लोबिन) का मुख्य कार्य ऑक्सीजन को फेफड़ों से प्राप्त करके शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाना है । श्वेत रुधिर कणिकाओं का कार्य शरीर में आये हुए रोगाणुओं से युद्ध करके उसे स्वस्थ बनाये रखने में सहायता करना है।

रुधिर प्लेटलेट्स – इन कणिकाओं का मुख्य कार्य शरीर के किसी भाग में चोट लग जाने या घाव हो जाने पर वहाँ थक्का बनाने में सहायता करना है ।

प्रश्न 18. स्टोमेटा के खुलने और बंद होने की प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ रुधिरों का खुलना एवं बंद होना रक्षक कोशिकाओं की सक्रियता पर निर्भर करता है। इसकी कोशिका भित्ति असमान मोटाई की होती है। जब यह कोशिका स्फीति दशा में होती है तो छिद्र खुलता है व इसके ढीली हो जाने पर यह बंद हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि द्वार कोशिकाएँ आस-पास की कोशिकाओं से पानी को अवशोषित कर स्फीति की जाती है । इस अवस्था में कोशिकाओं में पतली भित्तियाँ फैलती हैं, जिसके कारण छिद्र के पास मोटी भित्ति बाहर की ओर खिंचती है, फलत: रंध्र खुल जाता है। जब इसमें पानी की कमी हो जाती है तो तनाव मुक्त पतली भित्ति पुनः अपनी पुरानी अवस्था में आ जाती है, फलस्वरूप छिद्र बंद हो जाता है ।

प्रश्न 20. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है ?

(b) हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं ?

(c) मानव वृक्क में मूत्र- छनन क्रिया को समझाएँ ।

उत्तर ⇒ (a) लार भोजन के कार्बोहाइड्रेट को माल्टोज में बदलता है ।

(b) इससे ऑक्सीजन और कार्बन-डाईआक्साइड का परिवहन प्रभावित हो सकता है ।

(c) मानव वृक्क की वृक्कनालिकाओं के बोमैन कैप्सूल में रक्त की छनन क्रिया होती है । वहाँ से रक्त के उत्सर्जी पदार्थ जल के साथ संग्राहक नलिका से होते हुए मूत्राशय तक पहुँच जाते हैं। इस प्रकार मानव वृक्क में मूत्र- छनन क्रिया सम्पन्न होती है ।

प्रश्न 21. (i) गैसों के विनिमय के लिए मानव फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया जाता है ?

(ii) अमीबा में भोजन का अंतर्गहण और पाचन किस प्रकार होता है ?

(iii) हमारे शरीर में मूत्र बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है ?

उत्तर ⇒ (i) मानव फुफ्फुस में अनगिनत कुपिकाएँ होती हैं। यदि इनके सम्मिलित क्षेत्रफल का आकलन करें तो वह लगभग 80 वर्गमीटर के बराबर होगा । अतः इन कृपिकाओं की ही अभिकल्पना है कि हमारे फुफ्फुस का क्षेत्रफल अधिकतम हो जाता है ।

(ii) अमीबा कूटपादों के द्वारा भोजन को पकड़ता है और भोजन खाद्यधानी में बंद हो जाता है । खाद्यधानी में कोशिका द्रव्य से पाचक रसों का प्रवेश होता है इस प्रकार खाद्यधानी में उपस्थित भोजन का पाचन होता है। खाद्यधानी भ्रमणशील होती हैं । पचे हुए भोजन के अवयव खाद्यधानी से विसरित होकर कोशिका द्रव्य में मिलते रहते हैं ।

(iii) मूत्र बनने की मात्रा का नियमन उत्सर्जी पदार्थों के सान्द्रण, जल की मात्रा, तंत्रिकीय आवेश तथा उत्सर्जी पदार्थों की प्रकृति के द्वारा होता है ।

प्रश्न 22. रंध्र एवं वातरंध्र क्या हैं ? श्वसन में इनकी क्या भूमिका है ?

उत्तर ⇒ पौधों की पत्तियों की सतह पर असंख्य छोटे-छोटे छिद्र पाये जाते हैं, जो भीतरी पादप ऊतकों और बाहरी पर्यावरण के बीच गैसों का आदान-प्रदान करते हैं । इन छिद्रों को स्टोमेटा रंध्र (स्टोमेटा) कहते हैं। वायु अन्य जीवित कोशिकाओं तक विसरण के द्वारा पहुँचती हैं, वातरंध्र तनों के छाल में उपस्थित छिद्र है, जिनके द्वारा तना वातावरण से गैसों का आदान-प्रदान करता है । द्वितीयक वृद्धि के बाद वात रंध्रों को निर्माण इसलिए होता है, क्योंकि कॉर्क कोशिकाएँ अवकाशविहीन एवं सुवेरिनयुक्त होने के कारण अपारगम्य होती हैं । वातरंध्र स्टोमेटा के नीचे तथा कॉर्क कैवियम की क्रियाशीलता से बनते हैं। इनके निर्माण के दौरान कॉर्क कैबियम बाहर की ओर पतली भित्ति वाली पैरेनकाइमा कोशिकाएँ बनाता है जिन्हें पूरक कोशाएं कहते हैं। इन कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है जिससे बाह्य त्वचा टूट जाती है। उन स्थानों पर पूरक कोशिकाएँ सूक्ष्म छिद्र वातरंध्र सहित उभर आती हैं। इन कोशिकाओं के बीच में पर्याप्त अंतरकोशिकीय अवकाश होते हैं जिससे गैसों का विनिमय तथा जलवाष्प के रूप में निकलता रहता है ।

प्रश्न 24. डायलिसिस की प्रक्रिया को समझाइए ।

उत्तर ⇒ कई बार विपरीत परिस्थितियों के कारण गुर्दे अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं करते । शरीर में बनने वाला यूरिया तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थों को ये रक्त से छानने में असमर्थ हो जाते हैं जिस कारण रक्त में ये विषैले पदार्थ बढ़ने लगते हैं। तब डायलिसिस यंत्र का प्रयोग कर रक्त को साफ किया जाता है। इस यंत्र में रक्त सेलोफोन झिल्ली की बनी नलिकाओं में बहता है । इन नलिकाओं के बाहर रक्त का समपरासी लवण द्रव को बहाया जाता है। जिस कारण नलिकाओं के अंदर बहते रक्त से उत्सर्जी पदार्थ अलग होकर यंत्र के द्रव में आ जाते हैं और रक्त यूरिया तथा उत्सर्जी पदार्थों से मुक्त हो जाता है । इस क्रिया के बाद रक्त को शरीर में वापिस भेज दिया जाता है ।

प्रश्न 25. जंतुओं में गैसीय आदान-प्रदान में वर्णन कीजिए ।

उत्तर ⇒ जंतुओं में गैसीय आदान-प्रदान निम्नलिखित है ।

(i) सामान्य कोशिकाओं में सतह द्वारा – इसमें प्रक्रम श्वसन एक कोशिकीय जीवों अमीबा, पैरामीशियम, स्पंजों तथा सीलेण्ट्रेटम में होता है। इसमें जीव की कोशिकाएँ सीधे जल के संपर्क में रहती हैं तथा सामान्य विसरण द्वारा O2 को ग्रहण तथा CO2 को त्यागती है ।

(ii) त्वचा द्वारा – ऐनेलिडा (केंचुआ, जोंक, नेंरीज) ऐम्फिविया (मेढ़क) संघ के जंतुओं की त्वचा में कोशिकाओं का जाल फैला होता है, जिसकी सहायता से त्वचा गैसीय आदान-प्रदान करती है ।

(iii) श्वसन नलियों द्वारा – आर्थोपोडा समूह में जंतुओं; जैसे-कीटों, कॉकरोच, बिच्छू आदि में श्वसन (गैसीय आदान-प्रदान एवं परिवहन) पतली-पतली नलिकाओं द्वारा होता है जिन्हें ट्रैकिया (श्वसन नलिका) कहते हैं। ये पूरे शरीर में एक जाल – सा बनाती है, जिसे ट्रेकियल सिस्टम कहते हैं ।

(iv) गिल्स द्वारा – विकसित जलीय जीवों; जैसे- मछलियों, झींगों, मोलास्को, इकाइकोडमेंट्स, मेढ़क के टेड़पीलों आदि में गैसीय आदान-प्रदान गिल्स के द्वारा होता है ।

(v) फेफड़ों द्वारा – उभयचरों, स्तनियों, सहित कोर्डेटा के सभी जीवों में गैसीय आदान-प्रदान फेफड़ों द्वारा होता है। फेफड़ों द्वारा होनेवाली श्वसन क्रिया को फुफ्फुसी श्वसन कहते हैं। इनमें जीवों में एक विकसित श्वसन तंत्र पाया जाता है जिसके द्वारा वायु को फेफड़ों तक लाया जाता है तथा उससे बाहर निकाला जाता है । इस तरह फेफड़ों की सतह द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है ।

 

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