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Class 10th Physics Electricity Subjective vvi Questions 2024 [ भौतिकी ] विधुत सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024
Class 10th Physics Subjective Question Answer 2024 Class 10th Subjective Question

Class 10th Physics Electricity Subjective vvi Questions 2024 [ भौतिकी ] विधुत सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024

भौतिकी ( Physics) विधुत दीर्घ उत्तरीय सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024:- हैलो दोस्तो अगर आप मैट्रिक परीक्षा 2024 के लिए तैयारी कर रहे है तो यहां पर क्लास 10th Physics भौतिकी का महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर ( Class 10th Physics Long Type vvi Subjective Question Answer ) दिया गया है यहां पर क्लास 10th भौतिकी 2024 का मॉडल पेपर ( Class 10th Physics Model Paper ) तथा ऑनलाइन टेस्ट ( Online Test ) भी दिया गया है और PDF डाउनलोड कर के भी पढ़ सकते हैं । और आप मैट्रिक के फाइनल एग्जाम में अच्छा मार्क्स ला सकते हैं और अपने भाविष्य को उज्वल बना सकते है धन्यवाद –

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Class 10th Physics Electricity Subjective vvi Questions 2024 [ भौतिकी ] विधुत सब्जेक्टिव क्वेश्चन 2024

 

प्रश्न 1. (a) श्रेणीक्रम में संयोजित तीन विभिन्न मान के प्रतिरोधों के समतुल्य प्रतिरोध के लिए व्यंजक प्राप्त करें ।

सिद्ध करें, R = R1 + R 2

जहाँ R, श्रेणीक्रम में संयोजित प्रतिरोधकों R1 और R2 का समतुल्य प्रतिरोध है ।

(b)   

सिद्ध करें :

जहाँ R पार्श्वक्रम में संयोजित प्रतिरोधकों R1 और R2 का समतुल्य प्रतिरोध है।

उत्तर ⇒ (a) तुल्य प्रतिरोध वह एकल प्रतिरोध है जिससे एक सेल उतनी ही धारा भेजता है जितनी श्रेणीबद्ध प्रतिरोधकों से।

ओम का नियम प्रत्येक प्रतिरोध पर लगाने पर,
R1 पर विभवपतन = IR1, R2 पर विभवपतन = IR2.

अब कुल विभवपतन V के तुल्य है।

V=V1 + V2= IR1+ R2 = I(R1 + R2)

तुल्य प्रतिरोध R हो, तो समान धारा इससे प्रवाहित होगी ।
ओम के नियम से,
     V = IR
समीकरण (i) एवं (ii) से,
   IR = I(R1 + R2); R = R1 + R2
इस प्रकार, तुल्य प्रतिरोध श्रेणीबद्ध प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है।
(b) जब तीनों प्रतिरोधकों के प्रथम सिरों को एक बिन्दु पर एवं दूसरे सिरों को एक बिन्दु पर जोड़कर परिपथ पूरा किया जाता है तब इस प्रकार जोड़ने की विधि को पार्श्वक्रम संयोजन कहा जाता है ।
      संयोजक तार से चित्रानुसार परिपथ पूरा करते हैं  I प्लग में कुँजी लगाकर एमीटर से धारा I एवं वोल्टामीटर से विभवान्तर V ज्ञात करते हैं। माना प्रत्येक प्रतिरोधी तारों का प्रतिरोध क्रमश: R1 एवं R2 तथा संगत धारा क्रमशः I1 एवं I2 है।
∴ I = I1 + I2
माना प्रतिरोधकों के पाश्र्व संयोजन का समतुल्य प्रतिरोध R है। ओम के नियम से, I = V/R 

प्रत्येक प्रतिरोधकों पर ओम का नियम लागू करने पर,

 

प्रश्न 2. पार्श्वक्रम संयोजन किसे कहते हैं ? प्रतिरोधकों R1, R2 तथा R, पार्श्वक्रम में संयोजित करने पर समतुल्य प्रतिरोध का व्यंजक प्राप्त करें ।

उत्तर ⇒ जब तीनों प्रतिरोधकों के प्रथम सिरों को एक बिन्दु पर एवं दूसरे सिरों एक विन्दु पर जोड़कर परिपथ पूरा किया जाता है तब इस प्रकार जोड़ने की धि को पार्श्वक्रम संयोजन कहा जाता है। 

           संयोजक तार से चित्रानुसार परिपथ पूरा करते हैं। प्लग में कुँजी लगाकर मीटर से धारा I एवं वोल्टामीटर से विभवान्तर V ज्ञात करते हैं। माना प्रत्येक प्रतिरोधी तारों का प्रतिरोध क्रमश: R1 R2 एवं R3, तथा संगत धारा क्रमशः I1,I2 है। है ।

 

  ∴ I1+I2+I3
माना प्रतिरोधकों के पाश्र्व संयोजन का समतुल्य प्रतिरोध R है।

प्रश्न 3. ओम के नियम लिखें। उसके सत्यापन के लिए एक प्रयोग का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ प्रतिरोध चालक का वह गुण जिसके द्वारा विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध किया जाता है, उसे चालक का प्रतिरोध कहते हैं ।

यदि परिपथ की अन्य परिस्थितियाँ समान रहें तो प्रतिरोध बढ़ाने से विद्युत धारा कम हो जाती है तथा प्रतिरोध घटाने से विद्युत धारा बढ़ जाती है ।
प्रतिरोध का मात्रक = ओम (12)
विभावान्तर का मात्रक = वोल्ट (V)
प्रयोग का नाम: प्रतिरोधक के सिरों के बीच के विभवांतर पर धारा की निर्भरता का अध्ययन करना और उसके प्रतिरोध को ज्ञात करना।
आवश्यक उपकरण वोल्टमीटर, अज्ञात प्रतिरोध, परिवर्ती प्रतिरोध, आमीटर, संयोजक, संयोजक तार, कुंजी, सूखा सेल, रेगमाल (sand paper) आदि ।
सिद्धांत: ओम के नियमानुसार निश्चित ताप पर किसी चालक से प्रवाहित धारा उसके सिरों के बीच के विभ
बोना है। यदि धारा I तथा विभवांतर V हो, तो

         I = V/R

जहाँ R नियत होता है, इसे प्रतिरोधक का प्रतिरोध कहते हैं।

(i) आकृति के अनुसार उपकरणा का संयोजन करते हैं।

(ii) ऐमीटर तथा वोल्टमीटर की शून्य त्रुटि नोट करते हैं।

(iii) रियोस्टेट को ऐसे लगाते हैं कि परिपथ में कम-से-कम धारा प्रवाहित ह

(iv) ऐमीटर तथा वोल्टमीटर का पठन नोट किया जाता है।

(v) रियोस्टेट में प्रतिरोध का मान बढ़ाने पर धारा और विभवांतर

के पठन में परिवर्तन होता है, इन पठनों को नोट करते हैं।

(vi) इस प्रकार पाँच बार पठन नोट करते हैं।

(vii) ऐमीटर के पठन को x-अक्ष पर तथा वोल्टमीटर के पठन को

 

 

 

निष्कर्ष :

(i) प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवांतर बढ़ने पर धारा का मान बढ़ता

(ii) धारा एवं विभवांतर के बीच का आलेख सरल रेखा प्राप्त होता है। सावधानियाँ : है।

(i) संयोजन तार के सिरे को रेगमाल (Sand Paper ) से रगड़ कर व्यवहार करना चाहिए।

(ii) ऐमीटर तथा वोल्टमीटर के शून्य त्रुटि को नोट कर संशोधित पठन लेना चाहिए।

(iii) कम प्रतिरोध का रियोस्टेट प्रयोग करना चाहिए।

(iv) ऐमीटर तथा वोल्टमीटर के धन तथा ॠण सिरों को क्रमशः

सेल के घन तथा ऋण सिरों से संयोजित करना चाहिए।

(v) उच्च प्रतिरोध का वोल्टमीटर प्रयोग करना चाहिए।

(vi) परिपथ में धारा प्रवाहित करने के पूर्व इसकी जाँच अवश्य शिक्षक करवाना चाहिए।

(vii) पठन लेते समय केवल कुँजी को लगाना चाहिए।

प्रश्न 4. (a) ओम के नियम के अध्ययन के लिए एक विद्युत परिपथ खींचे।
(b) ओम का नियम लिखें।
(c) ओम के नियम को सत्यापित करने वाले /-/ ग्राफ को खींचें और उस ग्राफ की प्रकृति को लिखें।
उत्तर ⇒

(a) 
       

(b) ओम के नियमानुसार “यदि किसी चालक की भौतिक अवस्थाएँ; जैसे ताप आदि में कोई परिवर्तन न हो तो उसके सिरों पर लगाया गया विभवान्तर उसमें प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है ।”
यदि किसी चालक के सिरों पर विभवान्तर (V) वोल्ट लगाने से उसमें I एम्पीयर की धारा प्रवाहित हो, तो Vα I अथवा, V = RI
जहाँ R एक नियतांक है, जिसे चालक का प्रतिरोध कहते हैं । यदि ताप आदि भौतिक अवस्थाएँ न बदलें, तो R का मान निश्चित रहता है ।

(c) 

         

प्रश्न 5. ओम का नियम क्या है ? इसका प्रयोगशाला में सत्यापन कैसे करेंगे ?
अथवा,
ओम के नियम को लिखें। एमीटर एवं वोल्टमीटर द्वारा इस नियम की जाँच करें ।

उत्तर ⇒ ओम के नियमानुसार “यदि किसी चालक की भौतिक अवस्थाएँ; जैसे ताप आदि में कोई परिवर्तन न हो तो उसके सिरों पर लगाया गया विभवान्तर उसमें प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है ।”
यदि किसी चालक के सिरों पर विभवान्तर (V) वोल्ट लगाने से उसमें 1 एम्पीयर की धारा प्रवाहित हो, तो
VαI अथवा, I
जहाँ R एक नियतांक है, जिसे चालक का प्रतिरोध कहते हैं । यदि ताप आदि भौतिक अवस्थाएँ न बदलें, तो R का मान निश्चित रहता है।

ओम के नियम का सत्यापन करने के लिए किसी चालक जैसे मैगनीन का प्रतिरोधी तार लेते हैं। इसके श्रेणीक्रम में सेलों की एक बैटी, एमीटर, धारा नियंत्रक
तथा कुंजी लगाते हैं। तार के सिरों पर एक वोल्टमीटर लगाते हैं, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।
कुंजी लगाते ही पूरे परिपथ में विद्युत बहने लगती है। धारा (I) का मान एमीटर से तथा प्रतिरोधक के सिरों के बीच विभवान्तर (V) वोल्टमीटर से पढ़कर सारणी में लिख लिया जाता है। अब धारा नियन्त्रक द्वारा परिपथ में बहने वाली धारा का मान बदल-बदलकर हर बार एमीटर तथा वोल्टमीटर के पाठ सारणी में लिख लेते हैं ।
अब V तथा I में ग्राफ खींचते हैं। यदि ग्राफ एक सरल रेखा प्राप्त होता है, तो इसका तात्पर्य है कि तार के सिरों के बीच विभवान्तर तथा उसमें बहने वाली धारा परस्पर अनुक्रमानुपाती हैं अर्थात् चालक ओम के नियम का पालन करता है । यदि ग्राफ सरल रेखा प्राप्त न हो,
तो इसका तात्पर्य है कि चालक ओम के नियम का पालन नहीं करता ।

प्रश्न 6. प्रतिरोधों के श्रेणीक्रम संयोजन का तुल्य प्रतिरोध के लिए व्यंजक प्राप्त करें ।
अथवा, श्रेणीक्रम संयोजन को परिभाषित करें। एक विद्युत परिपथ में तीन प्रतिरोधक जिनके प्रतिरोध क्रमश: R, R, तथा R, है, को श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है। विद्युत परिपथ का तुल्य प्रतिरोध ज्ञात करें।

उत्तर ⇒ प्रतिरोधों का श्रेणीक्रम में संयोजन – जब भिन्न-भिन्न प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है तो परिणामी प्रतिरोध भिन्न-भिन्न प्रतिरोधों के जोड़ के बराबर होता है ।

         
जब चालकों को इस प्रकार जोड़ा जाए कि एक अंतिम सिरा दूसरे के पहले सिरे से तथा दूसरे का अंतिम सिरा तीसरे के पहले सिरे से तथा इसी प्रकार से ऐसे- आयोजन को श्रेणीक्रम संयोजन कहते हैं, जैसे आयोजन में सभी चालकों में से बहने वाली विद्युत धारा का मान समान होता है। मान लें प्रतिरोध R1, R2 तथा R3
श्रेणीक्रम में जोड़े गए हैं तो उनका कुल प्रतिरोध निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है
       R = R1+ R2 + R3

प्रश्न 7. S.I मात्रक के साथ विद्युत धारा, विभवान्तर और प्रतिरोध को परिभाषित करें और इनमें संबंध नियम की व्याख्या के साथ स्थापित करें।

उत्तर ⇒ विद्युत-धारा- विद्युत धारा का SI मात्रक एम्पियर है। किसी चालक के अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल से प्रति सेकेण्ड होने वाली आवेश की मात्रा एक कूलॉम हो तो विद्युत धारा I ऐम्पियर कहलाती है ।

विभवांतर – विभवांतर का SI मात्रक वोल्ट (V) है ।
किसी धारावाही विद्युत परिपथ के दो बिन्दुओं के बीच विद्युत विभवांतर को हम उस कार्य द्वारा परिभाषित करते हैं जो एकांक आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक लाने में किया जाता है

अतः, जब 1 जूल कार्य है जो एक कूलॉम के आवेश को एक बिन्दु से दूसरी बिन्दु पर ले जाए तो दोनों बिन्दुओं के बीच 1 वोल्ट विभवांतर होता है ।

विद्युत धारा, विभवान्तर और प्रतिरोध में संबंध ओम के नियमानुसार स्थापित होता है ।
यदि किसी चालक की भौतिक अवस्थाएँ जैसे ताप आदि में कोई परिवर्तन न हो तो उसके सिरों पर लगाया गया विभवान्तर उससे प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है ।
           V = IR
     जहाँ R एक नियतांक है ।
ओम के नियम का सत्यापन – एक चालक, जैसे मैगनीज का प्रतिरोधी तार लेते हैं। इसके श्रेणीक्रम में सेलों की एक बैट्री, एमीटर, धारा नियंत्रक तथा कुंजी लगाते हैं। तार के सिरों पर एक वोल्टमीटर लगाते हैं, कुंजी लगाते ही पूरे परिपथ में विद्युत बहने लगती है ।
धारा (1) का मान एमीटर से तथा प्रतिरोधक के सिरों के बीच विभवान्तर (V) वोल्टमीटर से बढ़कर सारणी में लिख लिया जाता है। अब धारा नियंत्रक द्वारा परिपथ में बढ़ने वाली धारा का मान बदल-बदलकर हर बार एमीटर तथा वोल्टमीटर से पाठ सारणी में लिख लेते हैं,
और पाते हैं कि V तथा I में ग्राफ़ एक सरल रेखा होती है ।

प्रश्न 8. इलेक्ट्रोप्लेटिंग (विद्युत लेपन) किसे कहते हैं ? इसे किस प्रकार किया जाता है ? इसके लाभ लिखिए ।

उत्तर ⇒ निकृष्ट धातुओं पर श्रेष्ठ धातुओं की तह जमाना विद्युत लेपन कहलाता है । इसका उपयोग आधुनिक समाज में बहुत बढ़ गया ।
ताँबे और जिस्त की दो प्लेटें लो । इन्हें कॉपर सल्फेट के घोल में डुबो दो । ताँबे की प्लेट को बैटरी के धनाग्र और जिस्त की प्लेट को ऋणाग्र से जोड़ो ।
इसमें पाँच मिनट के लिए विद्युत आवेश प्रवाहित होने दो। जिस्त पर ताँबे को लाल-भूरी तह जम जाएगी।

       
ताँबा सल्फेट पानी में Cu++, SO तथा H+, OH के आयन बनाता है। H+ की सांद्रता इसकी चालकता को बढ़ाती है। Cu++ आयन कैथोड की ओर तथा सल्फेट के आयन एनोड की ओर क्रिया करने के लिए बढ़ते हैं। SO4 – तांबे के साथ क्रिया करके कॉपर सल्फेट बनता है। एनोड से तांबा हटता है और कैथोड पर जमता है ।

इस विधि को श्रेष्ठ धातुओं की नकल बनाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है उपयोग-

(i) लोहे पर Ni, Cr, Co आदि की तह जमा कर उसे जंग से बचाया जा सकता है ।

(ii) चाँदी के आभूषणों पर सोने की तह जमा कर उनकी सुंदरता बढ़ाई जाती है

(iii) ग्रामोफोन की सूइयाँ बनाने में काम आती है ।

(iv) धातुओं के शुद्धिकरण में प्रयुक्त होती है

प्रश्न 9. शुष्क सेल की संरचना और उसका कार्य लिखिए ।

उत्तर ⇒ शुष्क सेल लक्लांची सेल का सुधरा हुआ रूप है। जिस धातु के छोटे बर्तन में कार्बन की छड़ ली जाती है जिसे MnO2 और चारकोल के चूरे से मलमल के कपड़े के द्वारा ढांप दिया जाता है। इसे जिस्त की डिब्बों के बीचो-बीच रखा जाता है । जिस्त ऋणाग्र का काम करता है और कार्बन की छड़ हनाग्र का ।
इसमें विलायक के रूप में NH2CI और ZnCI2 को डाला जाता है। MnO2 हाइड्रोजन गैस को बनने से रोकता है। जिस्त की डिब्बों को भली-भांति बंद कर दिया जाता है ताकि अंदर हवा न जा सके।
क्रिया- सेल में निम्नलिखित क्रिया होती है-
Zn→Zn++ + 2e
NH4CI → NH4 + CI
इलैक्ट्रॉन गति करते हैं और घोल में प्रविष्ट हो जाते हैं। (अमोनियम के आयन
कार्बन को आकृष्ट करते हैं तथा एनोड से इलेक्ट्रॉन को दूर करते हैं)
2NH4+ +2e →2NH3 + H2 ( एनोड पर )

इसमें जो हाइड्रोजन उत्पन्न होती है उसका MnO, के द्वारा प्रयोग कर लिया जाता है ।
H2 + MnO2 → Mn2O3 + H2O

जिंक आयन क्लोरीन से क्रिया करके ZnCI2 बनाते हैं ।
Zn++ + 2CI  →  ZnCl2
इस सैल का e.m.f. 1.45 V होता है

प्रश्न 10. वोल्टमापी किसे कहते हैं ? वोल्टमापी की रचना का वर्णन करें। इसके द्वारा दो बिंदुओं के बीच तथा दो ध्रुवों के बीच विभवांतर कैसे मापा जाता है ?

उत्तर ⇒ वोल्टमापी (Voltmeter) वह उपकरण जिसके द्वारा विभवांतर को मापा जाता है, उसे वोल्टमापी कहते हैं ।

     
रचना – यह एक विद्युतमापी उपकरण होता है। यह वोल्टों में अंशांकित होता है। इस अंकित पैमाने पर V अक्षर लिखा होता है। संकेत के रूप में इसे वृत्त से जिसके अंदर V लिखा होता है, दिखाया जाता है। यह विद्युत के चुंबकीय प्रभाव पर कार्य करता है । इसके एक ध्रुव पर + का चिह्न तथा दूसरे ध्रुव पर
का चिह्न लगा होता है । वोल्टमापी का धन ध्रुव बैटरी के धन ध्रुव के साथ तथा ऋण ध्रुव बैटरी के ऋण ध्रुव के साथ जोड़ा जाता है ।
   परिपथ के दो बिंदुओं के बीच विभवांतर ज्ञात करना – परिपथ के जिन दो बिंदुओं के बीच विभवांतर करना ज्ञात होता है, उसके समांतर वोल्टमापी को चित्र के अनुसार जोड़ते हैं, इसके ऊपर वाले पेचों पर + तथा – के चिह्न लगे होते हैं ।
परिपथ में जोड़ते समय इसके धन पेंच को बैटरी के (+) ध्रुव के साथ तथा इसके ऋण पेंच को बैटरी ऋण के ध्रुव के साथ जोड़ा जाता है ।
  ध्रुवों के बीच का विभवांतर ज्ञात करना – विद्युत उद्गम के ध्रुवों के बीच का विभवांतर मापने के लिए इसके ध्रुवों को वोल्टमापी के साथ सीधा-साधा जोड़ दिया जाता है । ऐसा करने से इसके ध्रुवों के बीच का विभवांतर पता चल जाता है ।

प्रश्न 11. (a) विद्युत परिपथ कहते हैं ? विद्युत सेल, विद्युत बल्ब, ऐमीटर एवं स्विच को दर्शाते हुए एक विद्युत परिपथ का आरेख बनावें ।
(b) श्रेणीक्रम में संयोजन के स्थान पर वैद्युत युक्तियों को पार्श्वक्रम में संयोजित करने के क्या लाभ हैं ?
(c) प्रतिरोधकता का S. I मात्रक लिखें ।

उत्तर ⇒ (a) विद्युत धारा के लगातार तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते हैं । विद्युत परिपथ का आरेख-

           

(b) लाभ-

(i) पार्श्वक्रम में संयोजित विद्युत उपकरण में से कोई उपकरण फ्यूज हो जाने से अन्य उपकरणों का कार्य इससे बाधित नहीं होता है ।

(ii) प्रत्येक उपकरण अपनी आवश्यकता के अनुसार धारा ग्रहण करते हैं, परिणामतः वे अच्छी तरह से कार्य करते हैं ।
(c) ओम-मीटर ( m)

 

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